coronavirus19
PM modi said in Man Ki Baat we are very sorry for public unconvinience but it is very essential for Nation

रविवार 29 मार्च की सुबह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की मन की बात सुनी, उनके मन की बात सुनकर मेरे मन में भी आशा की एक किरण फूटी| कोरोना वाइरस से विश्व के मानचित्र पर घटित हो रही विनाशलीला, मानवता पर उसका प्रभाव, योजनाओं के साथ सरकारी तैयारियां और धरातलीय हकीकत सभी कुछ मेरे मानस पटल पर धीरे-धीरे कोंधने लगी, मैं विचलित हो गई।

भारत में “कोरोना वाइरस” से लड़ने के लिए देशवासियों ने 21 दिन के बंद को सफल बनाने का बीड़ा उठा लिया था। केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा आर्थिक पैकेजों की घोषणा, मंदिरों एवं गुरुद्वारों द्वारा सहयोग एवं मानवीय सेवाओं का दौर भी आरंभ हो चुका था। उद्योगपतियों, सिने-कलाकारों, खिलाड़ियों, केंद्र एवं राज्य सरकारों के कर्मचारियों ने अपने-अपने 1सामर्थ्य अनुसार प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री राहत कोष में आर्थिक योगदान की सहायता का संकल्प भी ले लिया। समाजसेवी संस्थाएं एवं समाज-सेवक भी व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से मदद के लिए आगे आ गए।

विश्व स्तर पर टेलीविज़न की सुर्खियों में देखा गया कि दिल्ली के मुख्यमंत्री ने दिल्ली एवं विभिन्न राज्यों के प्रवासी गरीब श्रमिकों एवं मजदूरों के मसीहा बनकर बड़ी-बड़ी घोषणाएँ करके उन्हें कैसे आश्वस्त किया। आपदा की इस घड़ी में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी ने भी लुटियन जोन में गरीबों को भोजन के दस पैकेट बांटे। शरद पवार जी एवं सुप्रिया सुले जी का शतरंज खेलकर मोदी जी के आदेश का पालन करना भी हम सबने देखा। संजय राऊत जी का हारमोनियम बजाकर, महाराष्ट्र के पीड़ितों को शकुन पहुंचाने का प्रयास और मनोज तिवारी जी का क्रिकेट प्रेम एवं गाने का शौक इनकी संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा का परिचायक दिखा।

तभी अचानक शुक्रवार दिनांक 27.03.2020 को मौसम ने करवट बदली। आकाश में बिजली की चमक और बादलों की गड़गड़ाहट मानों किसी अनहोनी का संकेत दे रही थी। एक ओर झमाझम बारिश, दूसरी ओर भूखमरी के कारण अपने-अपने गांवों की ओर लौट जाने को उतावले लाचार तथा बेबस अप्रवासी श्रमिकों एवं मजदूरों का औरतों तथा बच्चों के साथ कूच करता रेला। बरसात में भीगते भूखे-प्यासे अबोध बच्चे, बीमार बुजुर्ग, औरतों एवं पुरुषों को दिल्ली से उत्तर-प्रदेश सीमा की ओर हजारों की संख्या में पलायन करते देखकर आत्मा चीत्कार उठी। सिलसिला केवल पलायन तक ही नहीं रुका, सैकड़ों/हजारों किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करने की विवशता के चलते, कुछ सड़कों पर वाहनों द्वारा कुचल दिये गए और कुछ ने शरीर तथा भूख से निढाल होकर सड़कों पर दम तोड़ दिया।

इतनी बड़ी तादाद में गरीब-मजदूरों का इकठ्ठा होना, किसी सुनियोजित षडयंत्र का हिस्सा था अथवा मात्र संयोग ? इसकी वास्तविकता की जांच तथा विश्लेषण पाठकों पर छोड़ती हूँ। टेलीविज़न पर दिखाये गये इन दृश्यों को देखकर स्वीकार करना होगा कि प्रधानमंत्री जी के 21 दिन तक घर पर ही रहने के आह्वान एवं सामाजिक दूरी के संकल्प की धज्जियां कुछ ही घंटों में उड़ा दी गई। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि शासन तथा शासन तंत्र को चलाने वाले इन गरीब लाचारों में विश्वास पैदा करने में असफल रहे। मैं नहीं जानती कि लाखों के लिए बनाया गया भोजन किसने खाया होगा या कौन खाएगा? निर्दोषों की मौत का जिम्मेदार कौन होगा? गरीब, लाचार मजदूरों/श्रमिकों तथा उनके परिवार की दुर्दशा के लिए जबाबदेही किसकी होगी? मानवीय लाचारी और बेबसी का दिल दहला देने वाला यही दृश्य 28 और 29 मार्च को भी दिखाई दिया। जब प्रशासन की तंद्रा टूटी, तब कुछ बड़े बाबू निलंबित हुये तथा कुछ को रविवार देर रात कारण बताओ नोटिस भी जारी हुए, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। किसी बेबस-मजबूर के दिल का दर्द कुछ ऐसे निकला होगा–‘बहुत देर से दर पे आँखें लगी थी, हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी, मसीहा मेरे तूने बीमार दिल की दवा लाते-लाते, बहुत देर कर दी’। पलायन से मौत का साया अपना तांडव ना फैलाये, अब तो बस यही प्रार्थना है।
आशा की किरण आज मन की बात सुनकर फिर से जागी है। इन लाखों मजदूरों के पलायन से अर्थ-व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका आंकलन भविष्य के गर्त में है। वर्तमान की आवश्यकता तो मानव एवं मानवता को बचाना है। पलायन की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद जिला मजिस्ट्रेट एवं पुलिस अधीक्षकों की व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी पलायन को रोकने और 21 दिन के बंद को सफल बनाने हेतु सरकार द्वारा तय की गई है। आज “कोरोना वाइरस” से बचने के लिए घर पर घरवालों के साथ सुरक्षित एवं स्वस्थ रहते हुए, सरकार पर भरोसा करने का समय हैं। 2-3 दशक पूर्व तक गाँवों-कस्बों में दादी-नानी, माँ और परिवार की महिलाएं बच्चों को बाहर जाने से रोकने के लिए भूत-प्रेत, चुड़ैल-डायन और हाबू के पकड़ लेने का भय दिखाती थी। इन सब अदृश्य डरावनी ताकतों को देखा तो डराने वालों ने भी नहीं, फिर भी घर में रोकने के लिए यह भय बहुत बड़ा था। चलिये आज फिर से इन अदृश्य डरावनी शक्तियों के प्रतीक “कोरोना वाइरस” से डरकर, इसे खत्म करने में अपना योगदान दे और मन की बात में प्रधानमंत्री जी के कल के संदेश को साकार एवं सार्थक करें।
प्रो. सरोज व्यास

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