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क्या आप कभी भूल सकते हैं इन गीतों को… ‘अभी न जाओ छोड़ कर के दिल अभी भरा नहीं”, ‘मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया”, अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम”, ‘रात भी है कुछ भीगी भीगी चांद भी है कुछ मध्यम मध्यम”, ‘तू चंदा मैं चांदनी, मैं तरुवर मैं साख रे”, ‘जब गमे इश्क सताता है तो हंस लेता हूं”,’ये दिल आैर उनकी निगाहों के साये”, ‘मेरे घर आना जिन्दगी, जिन्दगी”, ‘आपकी याद आती रही रात भर”।
          पहचान तो गये होंगे इन गीतों के संगीतकार जयदेव जी को। पूरा नाम जयदेव वर्मा। पैदाइश नेरोबी (केन्या) में 3 अगस्त 1919। पिता रेलवे में अधिकारी थे। पिताजी के दोस्त ने उन्हें एक माउथ आर्गन गिफ्ट किया। जयदेव ने बिना किसी ट्रेनिंग के उससे अफ्रीकन धुनें निकालनी शुरू कर दीं। जयदेव जब आठ साल के थे तो नेरोबी में अच्छे स्कूल न होने की वजह से उन्हें भारत भेज दिया गया। जयदेव भाई बहनों के साथ लुधियाना में आकर बस गये। आर्या स्कूल में उनका दाखिला करा दिया गया। उनकी माताजी उन्हें रामायण अौर भजन गाकर सुनाया करती थीं। जयदेव को बचपन से ही संगीत से लगाव था। जब वे पांचवीं जमात में थे तो उन्हें संगीत की प्रापर ट्रेनिंग के लिए उन्हें प्रोेफेसर बरकत रायजी से तालीम दिलवायी गयी। 1932 में जब वे सातवीं जमात में तो उन्होंने पहली फिल्म ‘अली बाबा चालीस चोर देखी”। यह बोलती फिल्म थी। इसमें अभिनेत्री कंचन का गाया गाना ‘बिजली गिरती है सदा ऊंचे मिनारों पर” उन्हें बहुत पंसद आया आैर वे उससे मिलने बारह साल की छोटी उम्र में बम्बई भाग गये। उन्हीं दिनों पिताजी भी भारत आये हुए थे आैर इत्तेफाक से बम्बई में ही थे। उनकी नजर जयदेव पर पड़ी आैर वे उन्हें अपने साथ लुधियाना ले आये। पिताजी को ज्योतिष का ज्ञान था। उन्होंने जयदेव की कुंडली देखी आैर घर में कहा कि यह जो कर रहा है इसे करने दो। पिताजी का सिंग्नल मिलते ही 1933 में वे बम्बई आ गये। इस बार उनकी भाग्यरेखा उन्हें एक्टिंग की तरफ ले गयी। वे वाडिया मूवीटोन में एज ए आर्टिस्ट भर्ती हो गये। उनकी पहली फिल्म ‘बावन अवतार” थी जिसमें उन्होंने नारद का रोल निभाया था। उसके बाद ‘हंटर वाली”, ‘वीर भारत”,’काला गुलाब”, ‘फ्रंटियर मेल”, ‘जोशे वतन” व ‘मतंड वर्मा” जैसी धार्मिक व सामाजिक फिल्मों में हर तरह के रोल किये लेकिन कोई पहचान न बन सकी। इस दौरान उन्होंने जावकर बंधु से संगीत ट्रेनिंग लेनी जारी रखा आैर रियाज नहीं छोड़ा। एक्टिंग से निराश हो उन्होंने गायन में हाथ आजमाने का प्रयास किया। 1940 में केदार शर्मा एक फिल्म बना रहे थे ‘नेकी बदी”। उसमें एक गीत गाने का आफर मिला लेकिन अस्थमा के अटैक की वजह से वे नहीं पहुंच पाये आैर इस घटना ने उन्हें तोड़कर रख दिया। उनका मन बम्बई से उचट गया। 1941 में उन्हें पता चला कि पिताजी की आंखों की रोशनी चली गयी। वे लुधियाना लौट आये। 1942 में पिताजी साथ छोड़ गये। 1943 में उन्होंने अपनी छोटी बहन की शादी करायी आैर संगीत में शिक्षित होने के चलते वे स्कूल में म्यूजिक टीचर हो गये। जल्दी ही समझ में आ गया कि संगीत की प्रापर एजूकेशन जरूरी है। उन्हें पता चला कि अल्मोड़ा में उस्ताद अलाउद्दीन साहब, अली अकबर व रवि शंकर साहब का संगीत का सेंटर है। लेकिन जब वे पहुंचे तो सेंटर बिखर चुका था। एक महीना यहां रुकने के बाद वे  संगीत तालीम के लिए लखनऊ पहुंच गये अली अकबर खान साहब के पास। उन्होंने जयदेव जी को अपना शार्गिद बना लिया। लखनऊ के लम्बे प्रवास के बाद वे अस्थमा के इलाज के लिए शिमला चले आये। यहां स्वामी रामतीर्थ की बहुत सी किताबों का अध्ययन किया आैर इतने मुतासिर हुए कि ऋषिकेश उनके आश्रम पहुंच गये। यहां से वे उज्जैन चले गये आैर शांति की खोज में 1947 तक यह भटकाव जारी रहा।
          संगीतज्ञय अली अकबर साहब दिल्ली में एक प्रोग्राम कर करने आये तो उन्होंने जयदेव से मिलकर पूछा, ‘जयदेव क्या कर रहे हो?”
         “दिल्ली रेडियो स्टेशन में गाने दो सौ रुपये माहवार गायक के रूप में लगे हैं।” वे जयदेव को अपने साथ जोधपुर ले गये। यहां एक रियायत में वे दरबारी गायक बन गये। दो साल यहां एक रियासत में उस्ताद के साथ गायन में सहयोग करते रहे। सभी रियायतों पर गाज गिरने लगी। यहां की भी सारी रियासतें खत्म हो गयीं। वे लखनऊ वापस आ गये। उस्ताद अली अकबर साहब ने कहा कि हमें बम्बई जाकर फिल्म लाइन में अपना भाग्य आजमाना चाहिए। 1951 दोनों बम्बई आ गये। नवकेतन की फिल्मों में संगीत देने के लिए केतन आनंद ने मौका दिया। ‘आंधियां” (1952) आैर ‘हमसफर”(1953) में अली अकबर साहब ने संगीत दिया। लेकिन दुर्भाग्य से देवानंद जैसा कलाकार व उम्दा गीत संगीत के होने के बावजूद फिल्में नहीं चलीं। अली अकबर साहब को लगा कि यह इंडस्ट्री उनके लिए नहीं बनी है और वे कलकत्ता चले गये। जयदेव साहब यहीं रुक गये। केतन आनन्द की अगली फिल्म ‘गाइड” का संगीत एस डी बर्मन साहब दे रहे थे। वे जयदेव को लेकर दादा के पास गये आैर उन्हें अपना एसिस्टेंट बनाने की वकालत की। अनेक असिस्टेंस होने के बावजूद दादा सहर्ष तैयार हो गये। जयदेव अपनी काबलियत के चलते शीघ्र ही चीफ असिस्टेंट बन गये। बर्मन दा के साथ उन्होंने नवकेतन की ‘गाइड”, ‘टैक्सी ड्राइवर”,’मुनीमजी”, ‘हाउस नम्बर 44″, ‘काला पानी”, ‘लाजवंती” के अलावा ‘चलती का नाम गाड़ी”, ‘सुजाता”, ‘इंसान जाग उठा” व ‘अग्निपथ” में बर्मन दा को एसिस्ट किया। सभी फिल्में गीत संगीत के लिए माइल स्टोन व सफल थीं।
         1955 में केतन आनन्द ने जयदेव को स्वतंत्र रूप से फिल्म ‘जोरू का भाई” में संगीत देने का आफर दिया। फिल्म चली नहीं। केतन आनन्द को आशा थी कि जयदेव में काबलियत है एक दिन उनका सिक्का जरूर चलेगा। उन्होंने ‘किनारे किनारे”, ‘समुद्री डाकू” (1956) व ‘अंजली” (1957) में उन्हें चांस दिया। गीत संगीत बेहतर होने का बावजूद फिल्में नहीं चलीं। चार साल तक उन्हें एक भी फिल्म ऑफर नहीं हुई। उनके पास न अपना मकान था न बैंक बैलेंस। वे स्टैबलिश भी नहीं हो पाए थे। एक चाहने वाले की रहमोकरम पर वे एक जगह पेंइंग गेस्ट के रूप में रहते थे। इसका उन्हें कोई पैसा नहीं देना पड़ता था। उनकी शादी की उम्र भी निकली जा रही थी। उन्होंने तय कर लिया कि किसी लड़की जिन्दगी बर्बाद नहीं करेंगे।
         वक्त ने करवट ली। 1961 में नवकेतन ने एक बार फिर फिल्म ‘हम दोनों” के लिए हाथ मिलाया। फिल्म आैर उसके सभी गीत सुपर डुपर हिट रहे। जयदेव को सही मायनों में दस साल बाद इस फिल्म से पहचान मिली। जिन्दगी में नाकामियों को स्वाद चखते चखते पहली बार उनकी झोली में सफलता का फल गिरा था। 1962 में सुनील दत्त साहब फिल्म ‘मुझे जीने दो” फिल्म बना रहे थे। उन्होंने जयदेव को अपनी फिल्म के  संगीत की जिम्मेदारी दी। फिल्म हिट रही। इस फिल्म ने उन्हें एक अलग पहचान दी। लेकिन इन दो कामयाबियों के बावजूद उन्हें लोगों ने भुला सा दिया। सुनील दत्त साहब 1971 में जब “रेश्मा आैर शेरा” बना रहे थे तो उन्होंने एक बार फिर जयदेव को संगीत की कमान सम्भालने का भार दिया। फिल्म फ्लॉप रही। लेकिन इसका संगीत बहुत ज्यादा फेमस हुआ। लताजी के गाये गीत ‘तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं साख रे” के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड से नवाजा गया। 44 वें एकेडमी अवार्ड के लिए फारेन लैंग्वेज केटेगेरी में इस फिल्म का चुनाव हुआ। लेकिन इन सब के बावजूद जयदेव की गिनती कहीं नहीं थी। ‘रेशमा आैर शेरा” के तीन साल के बाद उन्हें फिल्म ‘फासला” मिली। 1977 में ‘अलाप”, इसी साल उनकी एक आैर फिल्म ‘घरौंदा” आयी। इसके गाने भूपेन्द्र ने गाये थे जिसमें ‘एक अकेला इस शहर में रात में या दोपहर में” काफी पापुलर हुआ। 1978 में ‘तुम्हारे लिए”, 1979 में ‘दूरियां”, 1978 में मुजफ्फर अली की पहली फिल्म ‘गमन” आयी। इस फिल्म में उन्होंने ए. हरिहरन, सुरेश वाडकर व छाया गांगुली को मौका दिया। फिल्म तो कोई खास नहीं चली लेकिन छाया गांगुली के गाये एक गीत ‘आपकी याद आती रही रात भर, चश्मेनम मुस्कुराती रही रात भर” पर उन्हें दूसरा नेशनल अवार्ड मिला। फिर एक लम्बा सन्नाटा उनके जीवन में पसर गया। छह साल बाद 1984 में अमोल पालेकर की फिल्म ‘अनकही” के संगीत के लिए उन्हें तीसरा नेशनल अवार्ड मिला। उन पर समानान्तर सिनेमा के म्यूजिक डायरेक्टर का लेबल लगा दिया गया। पैरलर सिनेमा के नाम पर बन रही लो बजट फिल्मों में पैसा ना के बराबर था। 1986 में फिल्म ‘त्रिकोण का चौथा कोण” मिली। यह उनकी आखिरी फिल्म थी।
         वे एक उच्चकोटि के सरोद वादक थे। चार बार उन्होंने सुर सिंगार अवार्ड से नवाजा गया था। जब मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदत लता मंगेश्कर अवार्ड का एक लाख का इनाम लेने वे पहुंचे तो एक व्यक्ति ने उन्हें उल्हाना देते हुए क्रोधित स्वर में कहा,’जब तुम्हारे गुरु को यह अवार्ड नहीं दिया गया… तुम एक लाख रुपये की लालच में यहां आये हो?” जयदेव ने बहुत ही संयत स्वर में कहा,’भाई यह बात सही है कि मैं एक लाख रुपये के लिए ही आया हूं। सच बात तो यह है कि मैंने अपने पूरे जीवन में कभी इतने रुपये एक साथ नहीं देखे।” उनके दुर्भाग्य की पराकाष्ठा तो देखिए कि वे चेक लेकर आये तो कई अन्य कार्यों में इतना व्यस्त हो गये कि चेक को डिपाजिट करना ही भूल गये। जब उन्होंने चेक जमा कि आैर उसके पास होने की नौबत आती वे इस फानी दुनिया से ही पास हो गये।
         जयदेव जी 6 जनवरी 1987 को अचानक बीमार पड़े। किसी ने अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल में ही उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके पार्थिव शरीर को किसी ने क्लेम नहीं किया तो अस्पताल अथारिटी ने उन्हें लावारिस में फुंकवा दिया। उनके कमरे से पुराने अखबार, मैगजीन, एक छोटा सा फ्रिज व धूल से सना हुआ सरोद मिला। तीस साल तक फिल्म इंडस्ट्री के म्यूजिक फेटरनिटी का हिस्सा बनकर उन्होंने 41 फिल्मों के ढाई सौ से भी ज्यादा गीतों को संगीत से संवारा। लेकिन दुर्भाग्य ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा।
– प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव

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