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लल्लन ने कहा कि अपने घर में जो स्टोव है उसे अच्छी तरह से साफ करके यहां ले आओ। इसके बाद आर्यवंशी जी की पत्नी यानि हम लोग उन्हें चाची जी कहते थे। अपने घर से स्टोव अच्छी तरह साफ कर के लायीं लेकर आयी। लेकिन ये क्या लल्लन ने तो स्टोव देखते ही कहा- अरे !!! ये तो प्रभात कंपनी का पीतल वाला स्टोव नही हैं। किसी पास प्रभात कंपनी का नया वाला स्टोव ही लाना होगा। सबसे सब लोग लल्लन की इस बात से हैरान हो गये कि प्रभात कंपनी के स्टोव मे क्या खासियत है जो उसकी ही ही विशेष पूजा होनी है। सबसे खास बात यह थी कि यह सब ऐसे वक्त पर किया जा रहा था जब कि घर के आदमी अपने अपने काम पर निकले हुए थे। किसी ने कोई सवाल जवाब नहीं किया जैसे जैसे लल्लन बोलता रहा वैसे वैसे औरतों ने किया। साफ सुथरे चमकदार स्टोव को एक चौकी पर विराजमान किया गया। उसकी टंकी पर सिंदूर का टीका लगाया गया। फिर आरती की गयी फूल आदि से श्रृंगार किया गया। औरते नये वस्त्र धारण कर बड़ी श्रृद्धा भाव से हाथ जोड़ कर स्टोव को निहार रही थीं। लल्लन जो इस कार्यक्रम के सूत्रधार थे। एक एक निर्देश जारी कर रहे थे। अचानक लल्लन ने कहा सब लोग स्टोव देवता के नाम का जयकारा लगायेंगे। अब देवता जी के आने का समय हो गया हैं। सबके सब चौकन्ने हो कर अपनी जगह पर बैठ गये। सबको स्टोव देवता के दर्शन जो करने थे। सब के सब गौर से स्टोव की ओर टकटकी लगा कर देखने लगे।
अचानक लल्लन ने जोर से कहा देवता जी स्टोव में आ गये हैं। सब लोग हाथ जोड़ कर उनका आशीर्वाद लें। सब हैरान थे हम लोग कि लल्लन को कैसे पता चला कि देवता स्टोव में आ गये हैं। फिर भी जैसा लल्लन बोल रहा था हम लोग उसका पालन करने पे मजबूर थे। उसने धर्म और आस्था का ऐसा ताना बाना बुना था कि उससे बाहर निकलन औरतों के लिये असंभव तो नहीं लेकिन मश्किल जरूर था।
अचानक लल्लन ने कहा कि आपने देखा स्टोव देवता हम सब के बीच विराजमान हो गये हैं। सब लोग उन्हें सादर प्रणाम करें। ताकि उनका आशीर्वाद सबको मिल सके। जैसा लल्लन ने कहा हम सब आंख बंद कर सिर झुका कर स्टोव के आगे नतमस्तक हो गये। अचानक कुछ खटकने की आवाज हुई जब तक हम लोग आंख खोल उस आवाज का पता लगाते। लल्लन का स्वर सुनाई दिया कि स्टोव देवता ने आप सभी को आशीर्वाद दिया है। सब लोग हैरान कि इस बार भी हमें पता नहीं चला कि देवता ने हमें कब आशीर्वाद दिया लेकिन लल्लन को पता चल गया। लेकिन इसी बीच किसी ने पूछ ही लिया कि भइया देवताजी ने कब आशीर्वाद दिया हमें तो पता ही नहीं चला। लल्लन ने कहा न जाने कितनी बार भगवान हमारी सुन कर मदद करते हैं तो क्या हमें पता चलता है। लल्लन का तर्क काफी सही था। सब उसकी बात से सहमत हो गये। फिर किसी ने सवाल नहीं किया।
अब स्टोव देवता से अपनी परेशानियों के समाधान का सेशन चला रहा था। कोई अपने खोये हुए कंगन के बारे में पूछ रही थी तो कोई हार के बनने की बात पूछ रही थी। सवाल के जवाब में स्टोव देवता अपनी तीन टांगों में एक टांग उठा कर ठक करते एक बार ठक करते तो हां अगर दो बार ठक करें तो ना माना जाता था। बहुत सारे सवालों के जवाब हां में होता तो कई सवालों को जवाब ना में हौता। हर औरत अपनी अपनी समस्या को स्टोव देवता के आगे झुक कर बता रही थी। स्टोव देवता अपनी टांग हिला कर प्रतिउत्तर दे रहे थे। लल्लन देवता की ओर से समाधान बता रहे थे। यह कार्यक्रम शाम छह बजे तक चला। इस बीच लोगों ने स्टोव देवता के गुणगान किये गये।
कुछ दिनों बाद एक समाचार अखबार में छपा कि स्टोव बनाने वाली कंपनी प्रभात का बिजनेस काफी मंदा चल रहा था। उसने लोगों के बीच अपने स्टोव की मार्केटिंग के लिये इस प्रकार का धार्मिक सहारा लिया और बहुत से लोगों को ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने के लिये तैयार किया। शायद लल्लन भी उन्हीं लोगों में एक था, जो प्रभात कंपनी के स्टोव के प्रोमोशन के लिये स्टोव देवता नाम से प्रचार प्रसार में लगा हुआ था। अब लोगों को समझ में आ गया कि कोई स्टोव देवता नहीं होता वो केवल कंपनी द्वारा प्रचार कराने का एक तरीका मात्र था।

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