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यदि किसी को भारत के लोगों की विकृति मानसिकता का अंदाजा लगाना हो तो उसे बस सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे के बारे में लोगों के कमेन्ट पढ़ने चाहिए। ये लोग यूक्रेन में फंसे अपने ही देश के लोगों को गालियां दे रहे हैं। कोई कह रहा है कि उनको विदेश में पढ़ने जाने की जरूरत क्या है, कोई कह रहा है कि ये इतना खर्च करके विदेश जा सकते हैं तो वापसी के लिए महंगा टिकट भी खरीद सकते हैं, कोई तो इनको कम पढ़ लिखा बता रहा है तो कोई जनसंख्या को दोष दे रहा है तो कोई और आरक्षण को। कुल मिलाकर इनकी मानसिक इनसे वही कहलवा रही है जो आईटी सेल वालें इनके दिमाग में भर दे रहे हैं। आईटी सेल वालों की तो अपनी नौकरी की मजबूरी है। किसी पोलिटिकल पार्टी विशेष के लोगों को अपनी पार्टी का बचाव करना है पर अफसोस की बात ये है कि जनता के तौर पर मिडल क्लास के ये लोग क्यों खुद के दिमाग को गिरवी रख रहे हैं।

भारत में वर्ष 2021 में लगभग साढ़े आठ लाख छात्रों ने NEET परीक्षा उत्तीर्ण की। इनमें से मात्र लगभग 83000 को एमबीबीएस में दाखिला मिला। अर्थात परीक्षा पास करने वालों में से 10 प्रतिशत से भी कुछ कम को ही एमबीबीएस में दाखिल मिल सका। इसका अर्थ है कि हमारे पास मेडिकल की पढ़ाई का वो इन्फ्रस्ट्रक्चर ही नहीं है जो इतने सारे युवाओं को पढ़ा सके जबकि देश में योग्य डॉक्टरों की बहुत कमी है। प्राइवेट में भी इतने सारे छात्रों के लिए सीटें नहीं हैं और फीस करोड़ों में पँहुच जाती है जबकि यूक्रेन जैसे देशों में 19-20 लाख में काम हो जाता है। इसलिए कोई और विकल्प न होने के कारण वे छात्र वहाँ गए थे जो आज फंस गए हैं। जो बहुत ब्रिल्यन्ट और किस्मत वाले होते हैं और जिनके मां-बाप के पास पैसा होता है वो हार्वर्ड, ऑक्सफोर्ड, MIT, कैंब्रिज वगैरह में पढ़ते हैं और जिनकी नहीं होती वो किसी सस्ती जगह का जुगाड़ करते हैं। कोई शक नहीं कि सस्ती पढ़ाई करने वाले बहुत से युवा कम योग्य होते हों पर केवल इसके कारण उनको अपराधी नहीं माना जा सकता है। जब इस देश में डिग्री ही सबकुछ हो तो हर कोई जुगाड़ लगाएगा ही। यही तो योग्यतम की उत्तरजीवितता है जिसकी तुम लोग दुहाई देते फिरते हो। अपने सर्वाइवल के लिए इंसान हर तरह का काम करता है। इसलिए नैतिकता का खोखला उपदेश देना सबसे अनैतिक काम है। कुछ मूर्ख इसके लिए आरक्षण को गरिया रहे थे जबकि आरक्षण न भी होता तो भी कुल 83000 ही एमबीबीएस कर पाते। बाकी 8 लाख के लगभग तो फिर भी अड्मिशन से वंचित ही रहने थे।

फिर वो छात्र सरकार से ही पूछकर गए थे। जब उनको विदेश में पढ़ने के लिए अनुमति मिली तो जाहीर है कि ये अनुमति सरकार से ही मिली होगी, नहीं तो वे विदेश जा ही नहीं सकते थे। अपने नागरिकों को बचाना हर देश की सरकार का धर्म है। सरकार होती ही इसलिए है। जो लोग विदेश गए वो यहाँ के मिडल क्लास जितने ईमानदार, सत्यवादी, उच्च चरित्रवान भले ही न हों पर उन्होंने इस देश को टैक्स तो दिया है। अगर वे अब नहीं दे रहे हैं तो उनके मां बाप तो दे रहे हैं। और यदि किसी ने लोन लेकर अपने बच्चों को वहाँ भेज है तो उस लोन से यहीं के बैंक कमा रहे हैं। जब लोग विदेश जाते हैं तो एक इंडियन कम्यूनिटी वेल्फेर फंड (2009 में स्थापित) में उनको कुछ पैसा देना पड़ता है। ये फंड बनाया ही इसलिए गया था कि विदेश गए भारतीयों की सुरक्षा वगैरह की जा सके। इसलिए जिनको विदेश से लाया जा रहा है वो फ्री में नहीं लाया जा रहा है। इसलिए ‘हमारा टैक्स का पैसा, हमारा टैक्स का पैसा’ कहकर हर जगह र.रोना मत मचाया करो। वैसे भी ये रोना वही सबसे ज्यादा मचाते हैं जो हर तरह की बेईमानी, टैक्स चोरी कर अपना बैंक बैलन्स बना चुके होते हैं। वहाँ युद्ध हो रहा है कोई पिकनिक नहीं चल रही है। अगर तुम्हारा कोई सगा संबंधी इस स्थिति में फंस जाता तब भी क्या तुम यही कहते जो आज सोशल मीडिया पर कह रहे हो?

विदेशी तो अपने देश के अपराधी तक का बचाव करते हैं। निर्दोष भारतीय मछुआरों के हत्यारे इटालियन नेवी वालों को उनके देश ने बचाने के लिए हर संभव उपाय किए। चाहे वारेन एंडर्सन हो या डेवी, सभी को उनके देश ने बचाया। फिर ये भारतीय तो अपने ही देश के बच्चे हैं और पढ़ने गए थे न कि कोई चौरी-चकारी करके भागे थे। जब अपने ही देश के बच्चों के लिए (वो भी खाते पीते घरों के) तुम्हारी ये भावना है तो देश के गरीब और दमित लोगों के लिए क्या होगी? तुम लोग चौबीस घंटे राष्ट्रवाद का राग अलापते हो पर हकीकत यही है कि तुम लोग वो फ़र्जी राष्ट्रवादी हो जो इस देश के सबसे बड़े दुश्मन साबित हो रहे हो।

इसके साथ ही मैं कहना चाहूँगा कि युद्धकाल में हर तरह का propaganda और हर तरह की फ़र्जी खबर दोनों पक्षों द्वारा चलाई जाती है। किसी भी बात को केवल इसीलिए सच नहीं मान लेना चाहिए कि पीड़ित पक्ष ये कह रहा है तो सच ही होगा या कोई प्रतिष्ठित मीडिया हाउस कह रहा है तो सच ही होगा। युद्ध में हर तरह की रणनीति इस्तेमाल की जाती है। दुष्प्रचार और फ़र्जी खबरें इसका हिस्सा होती हैं। युद्ध में सच का पता युद्ध समाप्त हो जाने के बाद ही पता चलता है। इसलिए अफवाहों पर ध्यान न दें और अपनी मानवीय संवेदना को जिंदा रखते हुए अपनी बुद्धि-विवेक के दरवाजे खुले रख।
ASHOK KUMAR

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