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आपने बहुत देवी देवताओं के नाम तो सुने होंगे। बहुत से देवताओं के तो मंदिर में दर्शन करने भी गये होंगे। लेकिन आज में जिस देवता के बारे बात करने जा रहा हूं उन देवता का नाम आपने न तो सुना होगा और ही कोई मंदिर देखा होगा। आप भी सोव रहे होंगे कि मैं ऐसे ही तो बेवकूफ तो बना रहा। जी हां उन देवता का नाम था स्टोव देवता।
ये उन दिनों की बात है जब हम यानि हम भाई बहन काफी छोटे थे। कक्षा चार या पांच में पढते होंगे। उन दिनों आज की तरह के बच्चे काफी तेज नहीं हुआ करते थे। या यूं कहा जाये कि पहले बच्चे काफी सीधे और शांत स्वभाव प्रकृति के होते थे। बुद्धि भी इतनी तेज नहीं हुआ करती थी। आज कल हर हाथ में स्मार्ट फोन और हर घर में टीवी होता है लेकिन उन दिनों घरों नहीं ऐश की कोई वस्तु नहीं होती थी। बहुत ज्यादा हुआ तो रेडियो या ट्रांजिस्टर हुआ करता था। वही एक मनोरंजन का एकमात्र साधन हुआ करता था। हम लोग संडे का रेडियो पर फिल्मों के साउंड ट्रैक सुना करते थे। रेडियो पर बच्चों का एक कार्यक्रम बालसभा होता था। उसका हमें काफी इंतजार रहता था। रात में सवा आठ बजे हवा महल करके एक प्रोग्राम आता था। वो भी हम काफी पसंद करते थे। तो यह हो गयी हमारे मनोरंजन की बात। अब बात करते हैं स्टोव देवता की।
उन दिनों घरों में स्टोव या गैस की सुविधा नहीं हुआ करती थी। अंगीठी हुआ करती थीं घरों मंे। कुछ घरो मे ंतो बुरादा वाले चूल्हे होते थे। बात 1970-75 की रही होगी। हमारी मम्मी ने लकड़ी के चूल्हे पर भी खाना बनाया है और बुरादे वाली अंगीठी पे भी। उन्होंने बाद में जब मिट्टी के तेल से जलने वाला स्टोव आया तो पापा सबसे बड़ी और फेमस कंपनी प्रभात का स्टोव लाये थे। आस पड़ोस में किसी के घर पर स्टोव नहीं था। कुछ लोग तो हमारे घर पर सिर्फ स्टोव देखने ही आते थे। उसको जलाना भी काफी तकनीकी का होता था। शुरू मे ंतो स्टोव जलाने की जिममेदारी पापा की ही थी। पहले स्टोव में मिट्टी तेल कीप की मदद से भरा जाता था। फिर उसके जलाने की प्रोसेस शुरू होती थी। स्टोव में एक जगह हवा भरने के लिये एक पंप दिया होता था। पंप की मदद से स्टोव में हवा भरी जाती थी। इसके बाद बर्नर के पास जलती हुई तीली दिखा कर स्टोव को जलाया जाता था। इसकी यह खूबी थी कि जरूरत के हिसाब से लौ कम कर और ज्यादा की जाती थी। लकड़ी के बुरादे वाले व मिट्टी के चूल्हों इस प्रकार की सुविधा नहीं थी। पहले बुरादे वाली अंगीठी में बुरादा भरो फिर उसे जलाने का सही तरीका भी आना जरूरी होता था वर्ना अंगीठी जलती नहीं थी। इसकी मदद से औरतें जल्दी खाना बना लेती थी।
अब आते हैं स्टोव देवता के मुद्दे पे। हमारे घर के पास आर्यवंशी जी रहते थे। वो पापा के दोस्त थे। थे इसलिये कि वो अब हमारे बीच में नहीं हैं। उनके भी आधा दर्जन से ज्यादा बच्चे थे। चार लड़कियां और चार ही लड़के। भरा पूरा परिवार था उनका। वो साइंटिफिक उपकरणों व केमिकल की सप्लाई का काम करते थे। उसी से उनके परिवार का पालन पोषण होता था। उनके घर ही लल्लन नाम के आदमी का अक्सर आना जाना रहता था। उनके दूर का रिश्तेदार रहा होगा। हम सभी लोग उससे काफी घुले मिले थे। एक दिन वो घर पर आया तो उसने कहा कि आओ तुम सब को आज मैं जादू दिखाता हूं। इसके बाद वो हम सबको कमरे के अंदर ले आया। हम सभी बच्चे जादू देखने की खुशी में उसके पीछे पीछे कमरे में चले गये। लल्लन ने अपने झोले में से एक काजल रखने वाली डिबिया सी निकाली। हम लोग बड़े गौर से उसकी हरकत पर नजर रखे हुए थे। काजल जैसी दिखने वाली डिबिया में काजल तो नहीं लेकिन काला रंग का दर्पण सा दिख रहा था बिल्कूल दर्पण जैसा दिख रहा था। उसमे रौशनी पड़ने पर हम सबके चेहरे दिख रहे थे। उसने हम सबमें सबसे छोटे बच्चे को बुलाया और कहा इसमे देखा तुम्हें क्या क्या दिखेगा। छोटे बच्चे ने हां में सिर हिलाया। लल्लन ने कहा डिब्बी में गौर से देखना। उसने बच्चे से पूछा कुछ दिख रहा है गौर से देखकर बताओ। बच्चे ने कहा अभी तो कुछ भी नहीं दिखा। लल्लन ने कहा देखो एक आश्रम दिख रहा है अभी एक बाबा नजर आयेगा। देखो बाबा नजर आया। बच्चा थोड़ा घबराया उसने सिर हिला दिया। देखो एक आदमी दिखा जो झाड़ू लेकर आया है। अब वो आदमी आश्रम में झाड़ू लगा रहा है। अब बाबा जी पूरी करने जा रहे हैं। बच्चे को कुछ भी नजर नहीं आ रहा था लेकिन सबके सामने वो सिर हिला रहा था। उसके बाद लल्लन दो चार और छोटे बच्चों को डिबिया में देखने का बुलाया सबने जैसा लल्लन कहला रहा था वैसे वैसे बच्चे कहने लगा। कुछ न होने पर भी हम सब बच्चे इसे जादू का हिस्सा समझ रहे थे।
उस दिन लल्लन ने हम सब को जादू दिखाने के नाम पर ढोंग किया और हम सब बेवकूफों की तरह उसकी हां में हां मिलाते रहे। कुछ दिनों के बाद वो फिर घर पर आया। इस बार उसने सभी घरों की औरतों को अपनी बातों में उलझाया और कहा कि आज घर में देवता को वो बुलायेगा जो आपकी परेशानियों के समाधान बतायेंगे। औरतें तो वैसे भी धर्म के मामले मे ज्यादा सवाल जवाब करने से बचती हैं। उस समय भी ऐसा ही था जैसा आज के समय में है। धर्म, आस्था और परंपरा के नाम औरतों को पहले भी मूर्ख बना कर लूटा जाता था और आज भी बस तरीकों में अंतर आ गया है।
…..शेष अगली कड़ी में

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