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द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया था। आज़ाद हिंद फौज के लगभग 17000 सैनिकों को ब्रिटिश सरकार द्वारा आर्मी एक्ट के तहत अभियोजित किया गया। इस अभियोजन में INA के तीन मुख्य सैनिक, कर्नल प० प्रेम सहगल, गुलबख्श सिंह ढिल्लो एवं मेजर शाहनवाज खान शामिल थे। इस अभियोजन के 10 ट्रायल चले थे जिसमें सबसे प्रमुख एवं ऐतिहासिक लाल किले पर हुआ ट्रायल था। देश उस समय इन जवानों के साथ मजबूती से खड़ा हुआ था, चारो ओर प्रदर्शन हो रहे थे लोग सड़कों पर थे, ट्रायल के बीच हो रॉयल इंडियन नेवी ने भी विद्रोह कर दिया था, जिसे सरदार पटेल ने किसी तरह शांत कराया। (यदि यह बात अति राष्ट्रवादी अंग्रेज मुखविरी वंश के अनुयायी महानुभावों को whatsapp University चौराही इतिहासकारो के अफवाह मैसज से पता चल जाये तो कल को पटेल जी को देशद्रोही कह डालेंगे 😊 की क्यो उन्होंने नौ सैनिक विद्रोह शांत कराया, इसके पीछे पटेल जी का सोच था और ऐसी दूर दृष्टि की सोच होनी ही चाहिए, उन्होंने कहा कि सेना अनुशासन से चलती है यदि हम आज ऐसी विद्रोह परम्परा को समर्थन कर देंगे तो आजादी के बाद हमे ऐसी गलत परम्परा का सामना करना पड़ेगा जो देश की सुरक्षा हेतु उचित नही होगा)
मेजर शाहनवाज खान का मुकदमा मुस्लिम लीग ने, ढिल्लो का मुकदमा अकाली दल ने एवं प० प्रेम सहगल का मुकदमा अनेक हिन्दू संगठनों ने लड़ने की पेशकश किया जिसे तीनो ही वीर सपूतों ने ठुकरा दिया, एवं जबाब दिया था हम सब नेताजी के INA के सिपाही है हम किसी पंथ/धर्म के नही भारत की आज़ादी के सिपाही है, हमारे साथ खड़े होने का हक केवल आजादी की मातृ संस्था हम सब की अभिभावक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को है और कांग्रेस द्वारा बनायी गयी INA डिफेंस कमेटी को अपना मुकदमा लड़ने की मंजूरी दिया। इससे पूरे देश मे साम्प्रदायिक उग्रपंथीयो एवं ब्रिटिश सरकार को आजादी की साझी मांग की एकता संदेश गया और देश की साझी विरासत की एक बार पुनः छटा देखने को मिली।
कांग्रेस द्वारा बनायी गयी समिति के अध्यक्ष तेज बहादुर सप्रू जी एवं पंडित जी इसके उपाध्यक्ष बने, अन्य सदस्य में आसफ अली, भूलाभाई देसाई, कैलाश नाथ काटजू (मार्कण्डेय काटजू के दादा जी) जैसे महान कांग्रेस नेता थे। भूलाभाई देसाई की निर्देशन में ऐतिहासिक लाल किले में मुकदमा चलाया गया। इधर लालकिले के अंदर मुकदमा चलता इधर कांग्रेस सेवादल एवं फारवर्ड ब्लाक के नौजवान आज़ादी के सिपाही लाल किले के बाहर नारा लगा रहे थे:

“#40_करोड़_की_आवाज_ढिल्लो_सहगल_शाहनवाज”

इस नारे ने पूरे देश मे एक बार फिर से देशभक्ति की भावना भर दिया था। देश के हर जिले में कांग्रेसी,समाजवादी,आजाद हिंद फौज एवं फारवर्ड ब्लाक के सेनानियों ने इस नारे को गांव गांव पहुँचाकर एकता एवं स्वतंत्रता की साझी मांग का संदेश दिया। ब्रिटिश सरकार को अंत मे भारतीय जनता एवं स्वतंत्रता सेनानियों की मनोदशा एवं कांग्रेस की आक्रामक डिफेंस के जुनून को देखकर एवं बड़े देशव्यापी आंदोलन के होने के डर से ब्रिटिश सरकार द्वारा इन सिपाहियों को रिहा कर दिया गया।
उसके बाद पंडित जी ने INA डिफेंस कमेटी भंग कर एक आज़ाद हिंद फौज कोष की स्थापना कर उनके पुनरुद्धार हेतु अतुलनीय सहयोग किया। पंडित जी के निर्देशन में सभी मुख्य सैनिकों एवं शहीद सैनिकों परिवार को आर्थिक सहायता एवं गौरवमयी सम्मान प्रदान किया गया।
भारत की साझी संस्कृति किसी हिन्दू या किसी मुस्लिम या किसी ईसाई की संकुचित संस्कृति नही, यह सबको मिलाकर भारत की संस्कृति है, जिसे भारतीय संस्कृति कहा जाता है जिसकी ताक़त गंगा जमुनी तहजीब है, सनातन है एवं बहुलतावाद है। यह संस्कृति भारत की आत्मा है जिसका दर्शन हर युग मे होता रहेगा, कभी सहगल और शाहनवाज के रूप में कभी बिस्मिल और असफाक के रूप में। यही भारत है, आधुनिक भारत है जो आधुनिक है लेकिन अपने सांस्कृतिक जड़ो से जुड़ा है और जुड़ा रहेगा।
जय हिंद!
विनय कुमार नायक (गोरखपुर)
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