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निधि नित्या
हाकी खिलाड़ी वंदना कटारिया के घर पर , टोक्‍यो ओलिंपिक में भारतीय महिला हॉकी टीम के सेमीफाइनल में हारने के बाद आतिशबाजी की गई और , वंदना और उसके परिजनों को जातिसूचक शब्द कहे गए। मेहनत करके देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ी भी विश्व की सो कोल्ड जातिवाद समस्या से बचे नहीं रह पाए।
वंदना और उनके जैसे सभी खिलाड़ी जानते हैं कि ओलंपिक एक बड़ा प्लेटफार्म है स्वयं को सिद्ध करने का और किसी बात का विरोध करने का भी। हालांकि ओलंपिक संघ इस बात की इजाजत नहीं देता क्योंकि ओलिंपिक्स कमिटी का कहना है कि वो एक ग़ैर-राजनैतिक बॉडी हैं । उनका काम है, दुनिया के देशों को एक-दूसरे के साथ लाना । खेल और खेल भावना का जश्न मनाना और अंतरराष्ट्रीय एकता बनाना ।
हाँ तो, ये बात है 53 साल पुरानी सन् 1968 की है । उस बरस मैक्सिको सिटी ने ओलिंपिक्स खेलों की मेज़बानी की थी । यहां 24 साल के आफ्रिकन अमेरिकन एथलीट टॉमी स्मिथ ने 200 मीटर की स्पर्धा पूरी की और गोल्ड मेडल जीता । इसी मुकाबले में तीसरे नंबर पर रहकर कांस्य पदक जीता, अफ्रीकन अमेरिकन एथलीट जॉन कार्लोस ने । टॉमी और जॉन, दोनों ही अमेरिकी धावक थे । मुकाबले के बाद मेडल सेरमनी में दोनों खिलाड़ियों ने पदक लेते समय काले कपड़े , काले दस्ताने और बिना जूतों के बस काली जुराबें पहनकर अपने दोनों हाथ हवा में उठाकर , मुठ्ठी भींज कर अपना विरोध प्रकट किया। उनका विरोध सर्वश्रेष्ठ अमेरिका के भीतर काले-गोरे के भेद और नस्सली सोच के कारण सताए जा रहे और काले लोगों के साथ किये जा रहे भेदभाव और नफ़रती व्यवहार के विरुद्ध था।
उस साल के बाद इस साल ओलिंपिक्स से आई एक और प्रोटेस्ट की ख़बर भारत और अमेरिका को जातिगत भेदभाव और नस्सली वा रंगभेदी घटिया सोच में एक साथ लाकर खड़ा कर देती है।
 ये घटना बीते रोज़ यानी 1 अगस्त, 2021 की है। टोक्यो ओलिंपिक्स में शॉट पुट मुकाबले में सिल्वर मेडल जीतने वाली खिलाड़ी का नाम है, रेवेन सॉन्डर्ज़ । पदक लेने के लिए रेवेन मेडल सेरमनी में पहुंचीं । यहां मेडल रिसीव किया और पोडियम पर खड़े-खड़े रेवेन ने अपने दोनों हाथ हवा में उठाए और कलाइयों को जोड़कर क्रॉस का निशान बनाया । और इस तरह रेवेन टोक्यो ओलिंपिक्स में पोडियम प्रोटेस्ट करने वाली पहली खिलाड़ी बन गईं ।
रेवेन के इस प्रतीकात्मक विरोध का मुद्दा क्या था?
 रेवेन अमेरिका की हैं । ब्लैक हैं और समलैंगिक हैं । ब्लैक और समलैंगिक, दोनों ही सताए हुए वर्ग हैं । रेवेन के मुताबिक, उनके द्वारा बनाया गया क्रॉस एक इंटरसेक्शन है । एक ऐसा चौराहा, जहां आकर हर तरह के दबे-कुचले और उपेक्षित लोग एक-दूसरे से मिलते हैं । उनका विरोध रंग और जीवन जीने की स्वतंत्रता पर किये जाने वाले तंज और बुरे व्यवहार को लेकर है। ये ब्लैक लोगों के लिए है । LGBTQ कम्युनिटी के लिए है । हर उस इंसान के लिए है, जो समाज के वहशियाना बरताव के कारण मानसिक स्वास्थ्य की दिक्कतों से जूझ रहा है ।
वंदना यदि विजेता होती तो उनके पास भी एक अवसर होता इस तरह के विश्व मंच पर महान भारत की जातिगत निम्न सोच का पर्दाफाश करके भारत के नकली सोहाद्र की छवि की धज्जियां उड़ाने का। दुनिया भर में हज़ारों धर्म और जाति वा सम्प्रदाय  हैं , औऱ दुनिया भर में फैली नफ़रत और खून-खराबे का, हत्याओं का और हर तरह की हिंसा का एकमात्र कारण धर्म और जाति वा रंग हैं।
मुझे महिला हॉकी टीम के हारने का उतना अफसोस नहीं है जितना अफसोस इस बात का है कि भारत के वंदना जैसे खिलाड़ियों के हाथ से ओलंपिक का वो स्टेज चूक गया जहां जाकर वे एक औऱ रेवेन बन सकती थीं और भारत की छद्म सर्वधर्म समान वाली छवि का पर्दाफाश कर सकती थीं। भारत के भीतर घुन की तरह जमे जाति पर अभिमान करने वाले कीटों से भरे समाज को नग्न कर देने का अवसर वंदना से चूक गया। सम्पूर्ण विश्व के आगे , जाति के आधार पर तंज कसते घटिया लोगों के विरोध का अवसर वंदना से चूक गया। भारत के धर्म-जाति और रंग के आधार पर सड़ रहे छद्म नैतिकता वाले समाज को उखाड़ फेंकने का शंखनाद विश्व पटल पर करने का मौका , वंदना से चूक गया।
मुझे दुःख है कि वंदना रेवेन की तरह बागी बन जाने का मौका चूक गयीं। मेरी शुभकामनाएं हर रेवेन और वंदना को की तुम जाति , रंग और धर्म के आधार पर की जाने वाली नफ़रत और हिंसा के विरुद्ध अपनी भींजी हुई मुट्ठियों को और ताक़त से भरती रहो।
–निधि नित्या

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