इसी बीच 55 करोड रुपये पाकिस्तान को दिये जाने के प्रश्न पर भी कैबिनेट और विशेषकर सरदार पटेल के रवैये से गांधी बहुत दुखी हुये कि क्यों इस रक़म की वापसी को कश्मीर पर समझौते से जोड़ दिया गया? उन्हें यह अनैतिक लगा।
नेहरू और पटेल आदि अनशन कर रहे गांधी को कैबिनेट के निर्णय का औचित्य समझाने बिडला भवन पहुँचे। आँखों में आसूं लिये , चारपाई से उठने का प्रयास करते पटेल की ओर मुख़ातिब होकर, कमजोरी महसूस कर रहे गांधी ने कहा “ तुम वह सरदार नहीं हो, जिसे मैं किसी जमाने से जानता था (कालिंस और लापियर)। पटेल बहुत आहत हुये।
गांधी की वेदना को देखकर 14 जनवरी की शाम कैबिनेट ने पुनर्विचार कर पाकिस्तान को पैसा वापस करने का फ़ैसला लिया। पटेल ने उसी देर शाम गांधी को लिखा कि कल मैं काठियावाड जा रहा हूँ, पर कल आपकी वेदना (anguish) से मुझे बहुत परेशानी (disconsolate) हुई,जवाहरलाल का हृदय भी विषाद (grief) से भारी है । अब मेरी उम्र उनके साथ कामरेड की तरह सहयोग करने की नहीं रही। मौलाना भी मुझसे नाराज़ है। यह मेरे और देश के लिये अच्छा रहेगा यदि आप मुझे छोड़ दें (let me go)। मैं यह भी चाहता हूँ कि आप अपनी भूख हडताल त्याग दे। उल्लेखनीय है की भूख हडताल यद्यपि पटेल के विरुद्ध नहीं थी पर उसके कारणों में सरदार पटेल का ही गृह विभाग था।
गांधी गांधी थे। दिल्ली में हिंदू मुस्लिम एकता के लिये वह भूख हडताल कर रहे थे पर वह पूरी तरह मानते थे कि नेहरू और पटेल को सरकार नहीं छोड़नी चाहिये और दोनों को साथ मिलकर काम करना चाहिये । 15 जनवरी 48 को गांधी ने कहा कि पटेल मुँहफट ज़रूर है पर है बड़े दिल के । मेरी भूख हडताल बिलकुल ही पटेल के खिलाफ नहीं है। उधर पटेल की भावनायें भी धीरे धीरे गांधी और नेहरू के प्रति कोमल हो रही थी। 16 जनवरी को उन्होंने कहा (मेनन) कि नेहरू कुछ दिनों से 10 वर्ष बुजुर्ग हो गये है । 16 जनवरी को ही उन्होंने बम्बई में कहा, मैं हिंदू मुसलमानों को कटु शब्द कहता रहता हूँ पर मैं मुसलमानों का मित्र हूँ। कुछ लोगों ने मेरे लखनऊ में कह गये भाषण को लेकर गांधी से शिकायत की है और गांधी जी मेरा बचाव कर रहे हैं पर उससे भी मुझे दुख हो रहा है क्योंकि मैं इतना भी कमजोर नहीं हूँ कि कोई मेरा बचाव करें
शुरू शुरू में तो आम जनता गांधी के अनशन से सहमत नहीं हुई पर गांधी की बिगड़ती तवियत से धीरे धीरे दिल्ली के लोग और आम जनता भी घबड़ाने लगी। हिंदू और सिखों ने गांधी को भरोसा दिलाया कि वे मुसलमानों के खिलाफ बदले की भावना से आगे कार्यवाही नहीं करेंगे और सारी सम्पत्तियां उन्हें वापस की जायेगी । इस आश्वासन पर गांधी जी ने 18 जनवरी को अनशन तोड़ दिया ।दिल्ली शांत हो गयी।
उधर कालिंस और लापियर के अनुसार 14 जनवरी को बम्बई में नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे वीर सावरकर से उनके कार्यालय में मिले और 17 जनवरी को दोनों प्लेन से दिल्ली आये। उनके साथी मदन लाल और करकरे फ़्रंटियर मेल से , बडगे और गोपाल गोडसे दूसरी ट्रेनों से दिल्ली आये । ये सब हिंदू महासभा के विचारों से प्रभावित थे और गांधी की बातें इन्हे देश हित में नहीं लग रही थी । इनका इरादा था गांधी की हत्या । गांधी जो अभी अभी अनशन के दौरान बमुश्किल बचे थे। सभी को अलग अलग ज़िम्मेदारी दी गई थी ।मदन लाल को बम , गोपाल गोडसे और करकरे को हथगोले , बडगे को गोली मारनी थी नाथूराम और आप्टे पर्यवेक्षक थे और 20 जनवरी को दिये गये दायित्वों के अनुसार मदनलाल ने गांधी पर बिडला हाउस में प्रार्थना के बाद गांधी पर बम फेंका। शेष सब हड़बड़ा गये । मदनलाल पकड़ा गया । शेष भागने में सफल हुये।
पता नहीं कैसे पूंछताछ हुई, कैसे आगे किसी की गिरफ़्तारी नहीं हो पायी जबकि सभी साथी घटना स्थल के आसपास ही थे? पुलिस क्या करती रही? और 10 दिन बाद ही 30 जनवरी को इसी ग्रुप के लीडर गोडसे और आप्टे ने उसी बिडला हाउस में प्रार्थना के समय ही गांधी की हत्या करने में सफल हो गये। (कालिंस और लापियर-बारह बजे रात के)
गांधी की हत्या की सूचना पर पटेल तत्काल बिड़ला भवन पहुँचे और कुछ ही मिनट बाद ही नेहरू और माउंटबेटन पहुँचे। नेहरू गांधी के आगे घुटनों के बल बैठकर सर आगे रख बच्चों की तरह रोने लगे। माउंटबेटन ने आते ही पहला काम यह किया कि जवाहरलाल और पटेल को वे पास वाले कमरे में ले गए और उनसे कहा, ‘गांधी जी से पिछली बार जब मेरी मुलाकात हुई, उन्होंने मुझसे यह कहा था कि मेरी सबसे बड़ी इच्छा यह है कि सरदार और जवाहरलाल मिलकर परस्पर एक हो जाये। आप दोनों ‘अपने गुरु का चरण स्पर्श करो और शपथ लो कि तुम दोनों एक रहोगे?’ जवाहरलाल और सरदार ने एक क्षण एक-दूसरे को कातरता से देखा, फिर दोनों एक-दूसरे से लिपट गये। रात में राष्ट्र के नाम अपने ब्राडकास्ट में पंडित जी ने कहा: ‘हमारी जिन्दगी में जो रोशनी थी, वह बुझ गई -अब सलाह-मशविरे के लिए उनके पास दौड़कर जाने की बात खत्म हो गई।
गांधी जी का शव जब चिता पर रखा जाने लगा, जवाहरलाल ने उनके पाँव का चुम्बन किया। (दिनकर-लोकदेव नेहरू-पृ 147)
(रात से ही लगातार बारिश हो रही थी पर शर्मा जी और दीपक के साथ टहलने निकल पडा, कभी छाते के सहारे, कभी बिना छाते के टहलते रहे। जंगली फूलों पर पानी की बूँदें बहुत सुंदर लग रही थी।)

शैलेंद्र प्रताप सिंह
रिटायर्ड आईपीएस
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