पिछले तीेन चार माह से देश राजनीतिक हालात बदतर होती जा रही है। हर दल एक दूसरे दल को कमजोर करने में जुटा है। सत्ता के लोभ में नेताओं की खरीदफरोख्त में सभी दल जुटे हैं। सत्तारूढ़ दल बीजेपी के साथ लोजपा, कांग्रेस, भाजपा बसपा टीएमसी सभी जगह विधायकों और सांसदों की बोलियां लग रही हैं। नेता भी अपने फायदे के लिये कभी इस दल में तो कभी किसी दल में जाने को तैयार हैं।
ताजा में किस्सा यूपी में देखने को मिला है मायावती ने अपने दो विश्वसनीय विधायकों राम अचल राजभर और लालजी वर्मा को पार्टी से निकाल दिया। ़पिछले चार साल में 11 विधायकों को मायावती ने पार्टी से निकाल दिया है। पिछले विधानसभा में बसपा के 19 विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे थे। अब बसपा के पास 7 एमएलए ही रह गये हैं। यह भी सुनने में आया है कि पार्टी के निकाले जाने वाले सभी विधायकों ने सपा सुप्रमो अखिलेश यादव से मुलाकात की। मायावती इस मुलाकात की जानकारी को हुई तो उन्होंने अखिलेश यादव को ख्ुाली चुनौती दी कि यदि उन्होंने बसपा के निकाले गये विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल किया तो उनकी पार्टी भी टूट जायेगी। सपा के अनेक विधायक हमारे संपर्क में हैं। इससे पहले भी पिछले साल राजस्थान में बसपा के सभी विधायकों ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। बसपा ऐसा दल है जिसका विभाजन कई बार हुआ है। ऐसे हालात में भी मायावती यूपी में तीन बार कर मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। लेकिन उनके तानाशाही रवैये से नेता अब ऊब चुके हैं और मौका पाते ही दूसरे दलों में जाने पर मजबूर है।
प बंगाल में विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी ने टीएमसी के काफी विधायकों को पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया। इससे पहले 2019 में आम चुनाव के दौरान टीएमसी के पूर्व मुकुल राॅय ने तो भारी संख्या में पुरानी पार्टी के नेताओं को बीजेपी में शामिल कराया और बाद में वो बीजेपी के टिकट पर सांसद भी बने। लेकिन विधानसभा चुनाव में भाजपा को भारी झटका लगा। भाजपा उपाध्यक्ष मुकुज राॅय ने घर वापसी कर टीएमसी में जगह बना ली। यह भी चर्चा में हैं कि लगभग 3 दर्जन भाजपा विधायक और कुछ सांसद टीएमसी में शामिल होना चाहते है। इस बात में कुछ सच्चाई भी दिख रही है। हाल ही में भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने अपने विधायकों के साथ राज्यपाल जगदीप धनखड़ से मुलाकात की लेकिन उनके साथ केवल 50 विधायक ही मौजूद थे। लगभग दो दर्जन विधायक राज्यपाल से मिलने नहीं गये। इस बात की चिंता भाजपा को भी है। प बंगाल भाजपा नेतृत्व भी इस पलायन से परेशान हो गया है। यह भी सुनने में आ रहा है कि पार्टी के अन्य नेता व कार्यकर्ता गुस्से में हैं कि पार्टी में नेताओं की कमी है जो बाहरी आदमी को पार्टी में नेतृत्व दिया जा रहा है। सुवेंदु अधिकारी को जरूरत से अधिक तवज्जों मिलने से प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष भी खुश नहीं है। प बंगाल मेें बीजेपी को बहुत ही करारी हार झेलने के बाद अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को रोकने में भाजपा विफल दिख रही है।
ऐसा ही कुछ हाल कर्नाटक में देखने को मिल रहा है वहां बीजेपी की सरकार है और सीएम बीएस येदुरप्पा हैं। उनके खिलाफ भी बहुत सारे विधायकों बगावत कर दी है। उनके ही मंत्री ने केार्ट में शिकायत की है। लगभग 65 विधायकों ने उनके खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाया है। वहीं दूसरी ओर बीएस के बेटे ने भी अपने पिता के पक्ष में हस्तक्षर अभियान शुरू कर दिया है। लेकिन केन्द्री नेतृत्व ने साफ कह दिया है कि कोई नेतृत्व मे बदलाव नहीं किया जायेगा। ऐसा ही कुछ हाल गुजरात और मध्यप्रदेश में भी सुना जा रहा है। शिवराज और नरोत्तम मिश्रा के बीच तालमेल नहीं बैठ रहा है। गुजरात में भी सीएम विजय रूपाणी और मंत्रियों के बीच तनातनी चल रही है।
लेकिन कांग्रेस में तो किसी की नजर लग गयी है। किसी एक प्रदेश का मसला निपटता नहीं है दूसरी जगह का मसला सिर पर आ जाता है। पंजाब में सीएम अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीव मतभ्ेाद चैराह पर आ चुके है। मामला दिल्ली तक जा पहुंचा है। लेकिन अभी तक मामला सुलट नहीं पाया है। कांग्रेस आला कमान ने यह सुझाव दिया कि सिद्धू को डिप्टी सीएम पद दे कर बहला लिया जायेगा। लेकिन सुनने आया कि सिद्धू ने आला कमान के प्रस्ताव को नकार दिया है। दूसरी ओर राजस्थान में सीएम अशोक गहलौत और सचिन पाइलेट के बीच तलवारें खिंची हुई है। पिछले साल भी सचिन अपने समर्थक विधायकों के साथ जयपुर छोड़ दिल्ली चले गये थे। बडी मान मनौव्वल के बाद आश्वासन पा कर उन्होंने जयपुर लौटने की बात मानी थी। लेकिन दस माह में भी उनकी बात और वादे नहीं पूरे हुए तो एक बार फिर वो दिल्ली में रूठे बैठे हैं। उनको मनाने के लिये प्रियंका गांधी ने पहल की और उनकी बातों पर ध्यान देने का आश्वासन दिया है।

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