दुनिया का सबसे बड़ा साहूकार विश्व बैंक है।
भारत जैसे तमाम ग़रीब और विकासशील देशों को अपनी कुछ शर्तों पर कर्ज़ देता है।
इसी साहूकार ने हमारे महान प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को आइना दिखा दिया है।
विश्व बैंक ने कहा है जिस तरह से कोरोना की महामारी से निपटा जा रहा है, उसमें आगे भी इकॉनमी जाम रही तो भारत ने 2011 से 2015 के दौरान जो हासिल किया था वह भी खो देगा।
2011 से 2014 तक भारत ने कांग्रेस राज कर रही थी। 2014 में मोदी पच्चीसों झूठे वादे, जुमले फेंककर सत्ता में आये।
बचा 2015. इस एक साल में ऐसा कोई जादू तो हुआ नहीं। इसे हनीमून का दौर मान लें तो मोदी राज में भारत और ग़रीब होने जा रहा है।
2011-2015 के बीच भारत में ग़रीबी 21.6% से 13.4% पर आई थी। यानी फिर देश में लगभग हर चौथा व्यक्ति ग़रीबी की रेखा से नीचे आने जा रहा है।
लेकिन यह आधी सच्चाई है। पूरा सच रिपोर्ट के अगले हिस्से में है। विश्व बैंक कहता है कि इस समय आधा भारत उपभोग के हिसाब से ग़रीबी की रेखा के करीब है।
अब साहूकार कान खींच रहा है तो हमारे 56 इंच सीने वाले पीएम को सुननी तो पड़ेगी। कर्ज़ जो लिया है।
रिपोर्ट यह भी कहता है कि मोदी के 20 लाख करोड़ के पैकेज से कुछ नहीं बदला। रिपोर्ट में मोदी सरकार के खर्च को जीडीपी का 0.7-1.2% बताया गया है। यानी मोदी ने पैकेज को जीडीपी के 10% का जो दावा किया था, वह भी झूठा निकला।
रिपोर्ट की सबसे आखिरी लाइन नींद उड़ाने वाली है। कहा गया है कि 2022 में भी भारत की अर्थव्यवस्था में उछाल नहीं आ पायेगा।
विश्व बैंक की यह ड्राफ़्ट रिपोर्ट है। इसे मोदी सरकार को भेजा गया है। सरकार ने इसे विभागों को भेजा है।
अब सरकार कई फ़र्ज़ी आंकड़े जुटाएगी। नए झूठ गढ़े जाएंगे। फिर गोदी मीडिया इन्हें मास्टरस्ट्रोक के नाम से प्रचारित करेगी।
सरकार की गोदी में बैठे निकम्मे अर्थशास्त्री तकरीरें देंगे, झूठी दलीलें पेश करेंगे। शोधकर्ता फ़र्ज़ी दावे करेंगे।
कुछ मूर्ख मित्रों को लगता है कि राम मंदिर बनना शुरू होते ही सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी। असल में वे संवेदनाहीन हो चुके हैं।
जब संवेदनाएं मर जाती हैं तो ज़िंदा इंसान और लाश में कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता।
ग़रीबी अपनी लाश को उठाये फिरने का ही तो नाम

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