Chhorii Review: नेशनल फैमेली एंड हेल्थ सर्वे की एक खबर ने सुबह सबको चौंकाया कि देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा हो गई है. 1000 पुरुषों पर अब 1020 महिलाएं हैं. लेकिन इस अध्ययन को आगे देखने-समझने की जरूरत है. ऐसा इसलिए हुआ कि पुरुषों की जीवन प्रत्याक्षा 66.4 वर्ष के मुकाबले महिलाओं की जीवन प्रत्याक्षा 69.6 साल है. यानी पुरुषों के मुकाबले उन्हें अधिक आयु मिलती है. सर्वे में साफ है कि लिंग अनुपात में फर्क बरकरार है और 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 929 है. जन्म से पूर्व लिंग पता करने और भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति में कमी आई है. बावजूद इसके बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान देश की जरूरत है. इस लिहाज से छोरी जैसी फिल्मों की प्रासंगिकता बनी हुई है. यह अलग मुद्दा है कि निर्देशक विशाल फूरिया की फिल्म कैसी है. उसमें दर्शकों के लिए क्या है.

ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम पर आई छोरी मराठी फिल्म लपाछपी (2016) का हिंदी रीमेक है. मराठी फिल्म भी फूरिया ने लिखी-निर्देशित की थी. जिस रफ्तार से हिंदी में अन्य भाषाओं की रीमेक फिल्में आ रही हैं और ओटीटी पर मूल कंटेंट भी उपलब्ध है, उससे दर्शकों को यह सवाल परेशान कर रह है कि रीमेक की जरूरत क्यों. मामला बाजार से जुड़ा है. हिंदी के अपने सितारे हैं और हिंदी का दर्शक उनके नाम पर फिल्म देखता है. छोरी में नुसरत भरूचा हैं, जिनकी पहचान प्यार का पंचनाम सीरीज फिल्मों के लिए है. ढाई साल बाद वह दर्शकों के बीच लौटी हैं, गंभीर फिल्म के साथ. छोरी ऐसी गर्भवती साक्षी की कहानी है, जो शहर से दूर एक गांव में पति (सौरभ गोयल) के साथ आई है. जिस घर में वह रुकी है, वहां एक भूतनी का साया है. जो हर गर्भवती की दुश्मन है. क्या है राज. क्यों साक्षी का पति उस गांव में लाया. क्यों भूतनी को है गर्भवतियों से दुश्मनी. फिल्म इसके जवाब खोजती है.

मूल आइडिये में रोचक मालूम पड़ती छोरी की रफ्तार बहुत धीमी है. इसमें हॉरर का रोमांच नहीं है. दृश्य सिरहन पैदा नहीं करते और शुरू से अंत तक कोई फ्रेम ऐसा नहीं कि याद रहे. कई दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे हैं और संपादक ने कैंची चलाने में कसर छोड़ी है. इससे फिल्म ढीली रह गई. कुछ बातें तर्क से परे हैं, जिन्हें आप सिनेमाई छूट कह सकते हैं लेकिन कुल मिला कर बात नहीं बनती. फिल्म बेटी बचाओ मैसेज देती है मगर वह चमक खो चुके सिक्के जैसा लगता है. मृत नवजात कन्याओं से भरे कुएं का दृश्य बनावटी और अतिरंजित है. छोरी कुछ इस ढंग से बात कहती है कि जैसे भ्रूण हत्या की कुरीति और अंधविश्वास सिर्फ गांवों में हैं. एक और बात छोरी के निष्कर्ष में है कि औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है. नए जमाने में कई लोग इन बातों से इत्तेफाक शायद न रखें.

विशाल फूरिया दो घंटे से अधिक लंबी फिल्म में बांध नहीं पाते. न उनका निर्देशन कहानी को कसता है. छोरी के विस्तार के मुकाबले किरदार चुनिंदा हैं और स्क्रीन ज्यादातर खाली मालूम पड़ता है. हॉरर फिल्म में खाली जगहें और सन्नाटे का भी असर होता है, लेकिन वह इस फिल्म में कहीं नहीं दिखता. भुतहा फिल्मों को संवारने वाले बैकग्राउंड म्यूजिक का जादू भी यहां लापता है.

मीता वशिष्ठ और राजेश जैस अच्छे अभिनेता फिल्म में हैं लेकिन नुसरत भरूचा पर फोकस के चक्कर में विशाल फूरिया उनकी क्षमताओं का सही इस्तेमाल करना भूल गए. खास तौर पर राजेश जैस को उन्होंने कहानी में क्रिकेट टीम के ट्वेल्थ मैन जैसा बना दिया. मीता वशिष्ठ को पर्याप्त जगह मिली है और वह मंजी हुई अभिनेत्री हैं. मगर उन्होंने जिस अंदाज में संवाद बोले हैं, उनसे सहजता गायब है. जिस कहानी में परतें होनी चाहिए, वह सपाट ढंग से सामने आती है. नुसरत ने अपना काम निर्देशक के कहे अनुसार किया है और वह ठीक लगी हैं. लेकिन अन्य किरदारों को सही जगह मिलना और कथा-क्षेपकों के अभाव में फिल्म असर पैदा नहीं करती. गीत-संगीत की यहां कोई गुंजाइश नहीं थी तो वह नहीं है. अमेजन ने पिछले दिनों एक अन्य हॉरर डिबुक रिलीज की थी. इमरान हाशमी स्टारर वह फिल्म भी असर नहीं छोड़ पाई थी. हॉरर सबसे लोकप्रिय कंटेंट में से है लेकिन अमेजन का चयन इस मामले में कसौटी पर खरा नहीं उतरता नहीं दिख रहा.



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