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कोरोना वायरस ने हमारी जिंदगी बदलकर रख दी है। इस संकट में कुछ ऐसी तस्वीर भी सामने आती हैं जिनको देखकर दिल पसीज जाता है। जेठ की इस धूप में अपनी मां के आंचल का सहारा ले छोटे-छोटे मासूम भी सैकड़ों मील की यात्रा पर निकल चुके हैं। ऐसी यात्रा जिसकी शुरुआत का तो पता है पर अंत अंधेरे में है। दुधमुंहे बच्चे इस भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी को भी तरस रहे हैं।

मासूमों का हाल बेहाल

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तपती सड़कों पर लोग सहारे की तलाश करते हैं। ऐसे में अगर कोई ट्रक उन्हें बिठा भी ले तो सिर पर चमकता सूरज शरीर जला देता है। ये कष्ट केवल बड़े ही नहीं बच्चे भी झेल रहे हैं। पालने में झूलने की उम्र में वे ट्रक से झूल रहे हैं और मां की थपकी की जगह ट्रक के धक्के खाने को मजबूर हैं।

सुनसान अंतिम यात्रा

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भारत ऐसा देश है जहां जन्म और मृत्यु दोनों का उत्सव होता है। दुख और सुख दोनों में लोग इकट्ठा होते हैं। दुर्भाग्य ही है कि इस कोरोना संकट के समय पार्थिव शरीर के साथ अपने लोग भी नहीं रहते। अंतिम यात्रा में दो-चार लोग ही शामिल हो पाते हैं। कब्रिस्तान की यह तस्वीर बता रही है कि अब न केवल इंसान बल्कि शव भी अकेला पड़ गया है।

ट्रक से सामान ही नहीं इंसान भी ढोए जा रहे

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लॉकडाउन और कोरोना संकट ने अब ये दिन भी दिखा दिए हैं कि ट्रक न सिर्फ सामान ढोने के लिए प्रयोग में लाए जा रहे हैं बल्कि इंसान भी इस कड़ी धूप में, खुले ट्रक में सैकड़ों किलोमीटर का सफर करने को मजबूर है।

ठेके पर भी अनुशासन

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महीने भर बाद जब शराब की दुकानें खुलीं तो पियक्कड़ों की लंबी कतारें देखने को मिलीं। हालांकि पुलिस या कोरोना के डर से लोग कतारबद्ध खड़े दिखाई दिए। शराब के लिए लोगों ने 12-12 घंटे तक का इंतजार कर लिया।

डॉक्टर

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पहले तो डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में भी इतनी सुरक्षा नहीं रखते थे।कोरोना की वजह से अब डॉक्टर पीपीई किट में देखे जा रहे हैं। मरीजों को देखते वक्त वे काफी एहतियात भी बरत रहे हैं। तस्वीर में एक शख्स की जांच की जा रही है और डॉक्टर शीशे की दीवार के उस पार है।

सड़कों पर सन्नाटा

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सोचिए, अगर पैदल ही चलना था तो इतनी लंबी, चौड़ी कंकरीट की सड़कें बनाने की जरूरत क्या थी। बड़े-बड़े वाहनों के फर्राटा भरने के लिए बनाई गई ये सड़कें आज सुनसान हैं और इसपर अगर इंसान नजर भी आते हैं तो पैदल।

बाजार में भी ‘अकेले’

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बाजार का नाम लेते ही सबसे पहले जो तस्वीर उभरती है वह है भीड़ की। लेकिन आजकल आलम ये है कि तस्वीर थोड़ी दूर से ली जाए तो एक ही इंसान कैमरे में कैद होगा। मार्केट में भी सोशल डिस्टैंसिंग का पालन करना जरूरी है। साथ ही लोगों के चेहरे पर मास्क भी देखे जा सकते हैं।

ट्रेन बिहार जा रही है?

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इतनी खाली ट्रेनें हिंदुस्तान में विरले ही देखने को मिलती थीं और फिर अगर ये रेलगाड़ी बिहार जा रही हो तो इतने कम लोग ‘बर्दाश्त’ ही नहीं किए जा सकते। लॉकडाउन के इस वक्त में जो स्पेशल ट्रेनें चलाई गई हैं, उनमें सोशल डिस्टैंसिंग का भी ध्यान रखा जा रहा है। यात्रियों को नियम कानून का पालन करना है और वही लोग सफर कर पा रहे हैं जिनका टिकट कन्फर्म है।

जेठ की दोपहरी और पैदल लोग

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लॉकडाउन के बाद रोजगार छिन जाने के बाद प्रवासी मजदूर परिवार के साथ पैदल ही घर की तरफ रवाना हो गए। कितने ही लोग तो सड़क हादसों में मारे गए लेकिन इस संकट के दौर में घर के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा। किसने सोचा था कि इस वैज्ञानिक युग में लोगों को सैकड़ोें किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाना पड़ेगा?

ठेले पर परिवार

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इस ठेले का इस्तेमाल आपने सब्जी या चाट बेचने के लिए होते हुए ही देखा होगा। आज मजबूर लोग इसी ठेले के सहारे अपने बुजुर्ग परिजनों को सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करवा रहे हैं।

मजबूरी

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जो रेलवे ट्रैक ट्रेनों को दौड़ने के लिए बनाया गया है आज वहां मजबूर इंसान चलता नजर आ रहा है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक दर्दनाक हादसे में 16 मजदूरों की मौत भी हो गई। लोग करें भी तो क्या, ट्रेन नहीं मिली तो खुद ही चल दिए ट्रैक पर।

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