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National Confederation of Human Rights Org. organised Press conference at Press club of India

विनय गोयल
नयी दिल्ली। राजस्थान पुलिस का एक कारनामा सामने आया है। कुछ कांस्टेबलों ने इलाज के दौरान आये एक कैदी को इतना पीटा कि उसकी मौत हो गयी। इतना ही नहीं कैदी की मौत के एक दिन बाद उसके परिजनों को सूचित किया गया। गुस्साये परिजनों ने इम मामले की शिकायत जब राजस्थान के डीजीपी से की तो उन्होंने उन पुलिसकर्मियों को फटकार लगाते हुए कहा कि जब कैदी की हालत नाजुक थी तो उन्हें उसे जीप मे डाल कर वापस कोटा ले जाने की जरूरत नहीं थी। हालांकि पुलिस ने उन आरोपी पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया है। परिजनों की मांग है कि उन आरोपी कांस्टेबलों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज हो साथ उनके परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाये।
मामला कोटा के रहने वाले रिजवान के अब्बा मौहम्मद रमजान का है। जिन्हें 32 साल पहले 307 के मामले में पुलिस दुकान से पकड़ ले गयी थी। रमजान को लिवर की शिकायत थी। उनको बारा जेल में रखा गया। वहीं के एक अस्पताल में उनका इलाज होता रहा। लेकिन जब रमजान की बीमारी बढ़ी तो उन्हें कोटा मेडिकल कालेज में भर्ती कराया गया। उनको देखने उनका बेटा रिजवान और मां कोटा मेडिकल कालेज पहुचे थे। लेकिन वहां मौजूद कांस्टेबलों ने अब्बा से मिलने दिया। मिलाई के लिये पांच सौ रुपये की मांग की गयी। इस पर रिजवान और सिपाहियों के बीच तकरार हुई। इस बात को लेकर नाराज सिपाहियों ने रमजान को उल्टा लटका कर लोहे के पाइप से बुरी तरह पीटा। यह बात उसने अपने बेटे रिजवान से बतायी थी जिसका उसने वीडिया बना लिया था। जब उसकी हालत बिगड़ने लगी तो उसे जय पुर के सवाई माधो सिंह अस्पताल ले जाया गया। इलाज से रमजान की हालत में काफी सुधार आया तो उसे सिपाही जीप में लाद कर वहां उनकी हालत में सुधार आया था दो दिन के बाद वहां से कोटा ले गये। अगले दिन रिजवान के पास फेान आता हे कि तुम्हारे अब्बा मर गये हैं।
रिजवान को जब लगा कि राजस्थान सरकार से न्याय नहीं मिलेगा तो उसने दिल्ली आकर पत्रकार वार्ता कर अपनी शिकयात का जिक्र किया। इस मौके पर सुप्रीमकोर्ट के एडवोकेट श्रीजी भावसर और फजैल अहमद अय्यूबी ने भी राजस्थान पुलिस की इस हरकत पर गुस्सा जताया। श्रीजी भावसर ने कहा कि आज कल न्याय की उम्मीद रखना दिन में सपने देखना जैसा हो गया है। एक बार को संपन्न लोग मुकदमेबाजी में धन लगा कर न्याय की लड़ाई लड़ सकते हैं लेकिन उन गरीबों का क्या जो अपने परिवार का खर्चा बडी मुश्किल से चला पाते हैं वो लोग कोर्ट कचहरी का खर्चा कैसे उठा सकते हैं। यह एक बहुत ही विषम परिस्थितियां हैं जिसे समाज के जागरूक लोग ही बदल सकते हैं। जेएनयू के प्रो. अपूर्वानंद ने कहा कि यह किसी कर्मचारी का कुकर्म नहीं बल्कि वहां की सरकार की लापरवाही का नमूना है। सरकार एक ऐसी समिति का गठन करना चाहिये जो सरकारी विभागों की कार्य प्रणाली पर निगरानी करे। इन समितियों में सिविल सोसाइटी के ऐक्टिव लोगों को भी शामिल किया जाये। वैसे भी कांग्रेस की सरकार राजस्थान में है जो अपने को सेक्यूलर कहती है। सोशल ऐक्टिविस्ट नदीम ने कहा राजस्थान में यह पहली घटना नहीं है। पहलू खान और न जाने कितने ऐसे उदाहरण हैं जो जातीय हिंसा के नाम पर लोगों की हत्या की गयी। ऐसे लोगों को सरकारें सजा न दे कर उनका मनोबल बढ़ाती हैं। कुछ लोगों कोे सिर्फ इसलिये मार दिया जाता है कि वो जानवरों को अपने साथ ले जा रहा था। एक आदमी को सिर्फ इसलिये मार दिया जाता है कि वो किसी धर्म विशेष का है।

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