सौमित्र रॉय
कोरोना के कहर से बचने के लिये देश भर में तालाबंदी करने का फैसला केन्द्र ने किया था। दो माह से अधिक लॉक डाउन को होग या है। लाखों लोग बेरोजगार हो गये और शहरों में उनके बीवी बच्चे भूखे मरने लगे तो उन्होंने अपने गांव लौटन का फैसला लिया। कोई पैदल चला तो कोई साइकिल से तो कोई रेल की पटरियों के बगल में चलकर अपने घरों को वापस होने पर मजबूर हो गये। ऐसे में सैकड़ों प्रवासी मजदूरों की जान सड़क हादसों मे गयी हैं।
आज ईद के मुबारक मौके पर यह मनहूस खबर देने की मंशा बिल्कुल नहीं थी। लेकिन खबर को रोकना मेरे लिए अक्षम्य अपराध है। लॉक डाउन की इस पूरी अवधि में 24 मई तक देश ने कुल 667 मज़दूरों को खोया है। 205 प्रवासी मज़दूर पैदल अपने घर जाते हुए रास्ते में कुचलकर मारे गए हैं। भूख, तंगहाली ने 118 मज़दूरों की जान ली है। 120 मज़दूरों ने खुदकुशी की है। 42 मज़दूर सफर की थकान से मरे हैं। याद रखियेगा। इन सारी मौतों का बोझ मोदी के सिर पर है। ये निर्मम हत्याएं हैं।








