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पूरे देश में इस बात की चर्चा है कि छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों के दो दर्जन जवानों की दर्दनाक मौत मात्र एक आतंकी हमला है या गहरी साजिष है। सोशल मीडिया पर ऐसे कई पोस्ट डाले जा रहे हैं जिसमे साफ कहा जा रहा है कि जब भी चुनाव आते हैं तो ऐसे हमले होते हैं। इस प्रकार के हमले से केवल सत्ताधारी दल को फायदा होता रहा है। सत्ताधारी दल शहीदों के नाम पर वोट मांगती है और मासूम जनता उनकी राजनीतिक मंशा को समझ नहीं पाती है। पीएम मोदी ने लोकसभा चुनाव के प्रचार में शहीद जवानों के नाम पर वोट देने की अपील की थी। ऐसा करने पर भी चुनाव आयोग ने कोई कोई कार्रवाई नहीं की।
इससे साफ जाहिर हो गया है कि चुनाव आयोग का सत्ताधारी दल के काबू में है। छत्तीसगढ़ हमले में गंभीर रूप से घायल सीआरपीएफ के अधिकारी संजय द्विवेदी ने अपने बयान में कहा कि यह हमला सोची समझी साजिश का हिस्सा है। माओवादी हमले की पीछे मंशा हमारे जवानों को घेर कर मार डालने की योजना थी। माओवादियों को हमारी हर योजना की जानकारी थी। हमारी सभी योजनाओं को उन्हें कोई पल पल की खबर मिल रही थी।
ऐसा आतंकी हमला पहली बार नहीं हुआ है। पिछले तीन सालों का रिकार्ड उठा कर देखें तो लोकसभा चुनाव के ठीक पहले पुलवामा कांड होता है और उसमें चार दर्जनों से अधिक जवानों की जान गयीं।
बिहार के चुनाव के दौरान गल्वान घाटी में चीन ने हमारी सेना के एक कर्नल समेत दो दर्जन जवानों की हत्या कर दी जाती है। चीन और भारत के बीच पिछले दो तीन सालों से संबंध खराब होते जा रहे हैं। समाचारों की मानें तो भारत के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है। इस पर मोदी सरकार चुप्पी साधे है। पुलवामा, उरी, गल्वान के बाद अब छत्तीसगढ़ में हुए दो दर्जन जवानों की नृशंस हत्या की गयी है। इससे साफ जाहिर होता है कि चुनाव कोरोना और आतंकी हमलों के बीच कोई अनाम रिश्ता जरूर कायम है।

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