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मायावती ने यूपी के राजधानी में रैली का आयोजन कर बीजेपी, सपा, आप और कांग्रेस को मौका परस्त बताया। भाजपा को कहा कि वो ब्राह्मणों का विरोधी बताते हुए कहा कि आगामी चुनाव में बसपा ब्राह्मणों के साथ सर्वसमाज को जोड़ेगी। आप लोगों को झूठे आश्वासन दे कर चुनाव जीतना चाहती है। वैसे मायावती भी जानती कि यूपी में बसपा की क्या बिसात है। पार्टी के चंद विधायक ही बसपा के साथ हैं और मायावती का पल्ला पकड़ रखा। इस बात की भी कोई श्यारिटी नहीं है कि वो चुनाव तक बहन जी के साथ रहते हैं या किसी अन्य दल में भविष्य तलाशें। बसपा सुप्रीमो ने अपनी रैली में कार्यकर्ताओं को एक जुट होने की कही। बीजेपी शासन में योगी सरकार ने ब्राह्मणों को जो अपमान किया है। बसपा की सरकाकार बनी तो ब्राह्मण समेत सर्वसमाज को अहमियत मिलेगी।
बसपा को इतिहास उठा कर देखा जाये तो कई बार दिग्गज नेताओं ने पार्टी का पाला बदल किया। अधिकांश विधायकों को सपा ने अपने यहां जगह दी। 2017 के विधानसभा के चुनाव में 19 विधायक बने थे। फिलहाल बसपा में केवल चार पांच विधायक ही रह गये है। 10-12 विधायकों ने समाजवादी पार्टी ज्वाइन की है। राजस्थान में बसपा के आधा दर्जन विधायक बसपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गये। इस लिये मायावती की हिट लिस्ट में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सबसे से ऊपर हैं। 1990 के दशक में बसपा के लगभग 4 दर्जन विधायकों ने पाला बदल कर समाजवादी पार्टी का दामन लिया था। बसपा उस टूट को हमेशा याद रखेंगी। मायावती ने अपने विधायकों को काबू में रखने के लिये कार्यालय मे बंधक बना कर रखा। यह भी देखने को मिला कि विधायक दीवार फांद कर वहां से भागने पर मजबूर हो गये।
वैसे इतिहास गवाह है कि बसपा के नेता भी मौके का फायदा उठाने से बाज नहीं आते। नसीमुद्दीन सिद्धीकी मायावती के बहुत ही करीबी और विश्वसनीय नेता थे। उनके भी मायावती बड़ी बेइज्जती करके पार्टी से निकाला था। कांग्रेस ने नसीमुद्दीन को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। ऐसा इस लिये किया गया कि यूपी में कांग्रेस के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जिसे वो चेहरा बना सकें। ऐसा ही कुछ स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ भी हुआ। उन्होंने भी 2019 के आम चुनाव में पाला बदलते हुए बीजेपी का दामन थाम लिया। भाजपा ने उनकी बेटी और बेटे को टिकट दिया और बेटी संघमित्र आज सांसद बनी हुई हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य आज यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य भी किसी समय में मायावती सरकार में खासम खास नेता माने जाते थे। लेकिन मायाती के रूखे तानाशही खफा थे। मायावती ने भी उन्हें पार्टी से निकाला था।
मायावती रूखे व तानाशाही रवैये से नाराज नेतागण पाला बदलने पर मजबूर हुए। इसका सबसे ज्यादा राजनीतिक फायदा समाजवादी पार्टी को हुआ। अगले चुनाव में भी समाजवादी पार्टी को होने वाला है। बसपा के बचे हुए विधायक भी मौके की फिराक में हे।

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