big bjp leaders
Sr. BJP leaders feeling insult due to Modi and Bjp not giving importants.

नयी दिल्ली। राजनीति में दिन कैसे बदलते हैं यह दिल्ली की राजनीति में देखा जा सकता है। पिछले कुछ सालों पर नजर डालें तो समझ में आता है कि कुछ राजनेता जो मेन स्ट्रीम के धुरी माने जाते थे। आज वो गुमनामी की जिंदगी में खो गये हैं। कभी उनकीे तूती बोलती थी आज उनकी बोलती बंद कर दी गयी है। मूकदर्शक बन कर अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं।
पहले बात करें देश की सत्तादल भाजपा की जिसमें दिग्गज और वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी की। लेकिन इससे पहले बीजेपी के पहले लोकप्रिय प्रधानमंी अटल बिहारी वाजपेयी की। जिन्हें वर्तमान प्रधानमंत्री दो तीन दिन ही उनको याद करते थे। बेबस लाचार अटल जी अपनी मौत के दिन गिन रहे थे। उनकी मौत को भी बीजपी ने कैश करने की बहुत कोशिश की लेकिन उनकी मंशा पूरी नहीं हुई और राजस्थान, मघ्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ उनके पंजे से आजाद हो गये। अटल जी ईसा मसीह के जन्मदिवस पर पैदा हुए और स्वतंत्रता दिवस पर आजाद हो गये। लेकिन अगर बीजेपी के ढंग से सोचें तो अटल जी को चार माह बाद मरना चाहिये था ताकि भाजपा उनकी शवयात्रा को पूरे देश में घुमाकर अपने लिये वोट मांग सकती। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अटल जी तीन प्रदेशों में चुनाव से पहले ही मर गये। वैसे बीजेपी ने उनकी अस्थ्यिों को भाजपा शासित प्रदेशों में अपने प्रचार के लिये इस्तेमाल किया। चुनाव के दिनों में पीएम और अमित शाह को अटल जी और आडवाणी याद आते हैं। लेकिन इस बार तो आडवाणी को पार्टी ने उनकी पारंपरिक गांधीनगर सीट से भी बेदखल कर दिया। उनकी सीट मोदी के परममित्र अमित शाह को दी गयी है। इसी तरह मुरली मनोहर जोशी जी को साफ संदेश दिय ागया कि वो स्वयं ऐलान कर दंे कि वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं।
पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने तो पार्टी के तौर तरीकों से तंग आ कर पार्टी को छोड़ ही दिया था। एक बार अरुण जेटली ने सिन्हा पर तंज कसा कि 75 की उम्र में भी नौकरी की चाह है। चूंकि यशवंत सिन्हा ने अरुण जेटली और मोदी की नीतियों सवाल खड़े किये हैं। इसलिये वो यशवंत सिन्हा को फूटी आंख नहीं देखना चाहते हैं। यही वजह रही कि मोदी सरकार बनते ही मोदी ने यशवंत सिन्हा, शांता कुमार, डा. मुरली मनोेहर जोशी जैसे बडे़ नेताओं को सक्रिय राजनीति से बेदखल कर दिया। कलराज मिश्र ने तो कहने से पहले ही मोदी शाह के आगे हथियार डालते हुए यह कह दिया कि वो आम चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं। लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और उमा भारती ने भी चुनाव लड़ने से मना कर दिया है।
अब बात करते हैं आम आदमी पार्टी की जिसकी दिल्ली में सरकार बनते ही पार्टी में बिखराव शुरू हो गया। पार्टी के बड़े नेता योगेंद्र यादव, वरिष्ठ एडवोकेट प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार और न जाने कितने नेता पार्टी से नाराज हो कर अपना नया दल स्वराज इंडिया बना लिया। स्वराज इंडिया के बैनर तले योगेंद्र यादव ने एमसीडी के चुनावों में अपने उम्मीदवार भी उतारे। लेकिन उनकी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। इसी कड़ी में मोहम्मद आसिफ खान, दिल्ली सरकार में मंत्री रहे कपिल मिश्र, पूर्व मंत्री जितेंद्र सिंह तोेमर, शाजिया इल्मी, अश्विनी उपाध्याय और सबसे पुराने और विश्वसनीय नेता कवि कुमार विश्वास ने भी केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाते हुए पार्टी से किनारा कर लिया। चुनाव घोषणा के बाद गांधी नगर के विधायक अनिल वाजपेयी बौर ब्रिजवासन के विधायक कर्नल देवेंद्र सिंह सहरावत ने भी आम आदमी पार्टी को छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया है।

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