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मोदी सरकार ने आनन फानन में अगला चुनाव आयुक्त की घोषणा कर दी है। लेकिन सरकार की इस नियुक्ति पर सुप्रीम कोट ने ऐतराज जताते हुए उनके चयन प्रक्रिया पर संशय जताया है। इससे मोदी सरकार बुरी तरह बौखला गयी है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयुक्त बिल्कुल निडर और निष्पक्ष हो। जो पीएम के खिलाफ ऐक्शन लेने में चूके नहीं। सरकार की आंख में आंखें डाल कर सवाल पूछ सके। आज टीएन शेषण सरीखे चुनाव आयुक्त की जरूरत है। उनके समय में किसी भी राजनेता की हिम्मत नहीं होती कि चुनाव आयोग के निर्देशों का उललंघन करने की हिमाकत कर सके। आज के चुनाव आयुक्त तो सत्ताधारी दल के इशारों पर झुकते देखे जाते हैं। विपक्षी लाख शिकायत दर्ज करायें लेकिन आयोग सिर्फ सरकार की शिकायतों पर ही ऐक्शन लेता दिखता है। एसजी तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि ये मामला संसद व सरकार के अधीन आता है इसलिये सुप्रीम कोर्ट इसमे दखल न दे। अगर उसके पास कोई सलाह है तो वो सरकार को सलाह जरूर दे। आईएएस अरुण गोयल ने वीआरएस लेते हुए सोमवार को चुनाव आयुक्त का पद संभाला था। अरुण गोयल का रिटायरमेंट एक माह बाद होना था लेकिन इस बीच सरकार ने उन्हें चुनाव आयुक्त पद पर नियुक्त कर दिया। शनिवार को सरकार ने श्री गोयल की फाइल राष्ट्रपति के पास भेजी और गोयल के नाम पर मुहर लगा दी गयी। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्र और अनूप पाण्डे ने गोयल के नाम पर सहमति जतायी।
सुप्रीम कोर्ट ने नये चुनाव आयुक्त के चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अरुण गोयल की फाइल सरकार से मांगी है ताकि चयन की पारदर्शिता पता चल सके। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से यह सवाल किया कि नये चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की इतनी जल्दी क्या थी कि वीआरएस लेने वाले आईएएस अफसर को रिटायर होने से पहले ही चुनाव आयुक्त बना दिया गया। जबकि इस मामले की सुनवायी सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने तुषार मेहता के तर्क पर कहा कि हमें अरुण गोयल की नियुकि्त पर कोई ऐतराज नहीं लेकिन उनके चयन प्रक्रिया पर संदेह है।

मालूम हो कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आयी है तब से मुख्य चुनाव आयोग और आयुक्त सत्ता पक्ष के साथ खड़े देखे जाते हैं। किसी चुनाव में सत्ताधारी दल की सहूलियत का ध्यान रखा जाता है। पिछले साल 5 राज्यों में चुनाव हुए। प बंगाल के चुनाव के लिये आठ चरण में मतदान कराया गया। इस बात को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाये थे। अक्सर यह देखा जाता है कि सरकार के विरोधी दल कोई शिकायत दर्ज कराता उस चुनाव आयोग चुप्पी साध लेता है। लेकिन सरकार या सत्ताधारी दल की शिकायत पर त्वरित कार्रवाई कर देता है। ताजा मामला यूपी के रामपुर का है सपा विधायक आजम खां की विधायकी रद करने को लेकर चुनाव आयुक्त और यूपी सरकार काफी सक्रिय दिखी। इस बात को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग और यूपी सरकार को लताड़ भी लगायी थी। यह भी देखा जाता है कि चुनाव आयोग सरकार के इशारों पर ही चुनाव की तारीखें ऐलान करता है। राजनीतिक दल तो चुनाव आयोग पर यह आरोप लगाते हैं कि ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स के साथ चुनाव आयोग भी सरकार की अप्रत्यक्ष रूप मदद करने से नहीं चूक रहा है।

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