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क्या आज के युग में लोगों को किसी भी धार्मिक कार्य की सूचना मोबाइल फोन पर एसएमएस ,वाट्सएप संदेश या वीडियो संदेश के ज़रिए नहीं दी जा सकती ?क्या इसके लिए लाऊडस्पीकरों का शोरगुल भरा इस्तेमाल बहुत जरूरी है? ये सवाल इसलिए कि देश के कुछ शहरों में इन दिनों धर्म स्थलों में लाऊडस्पीकर बजाने की जिद्द पर अड़े कुछ लोग सामाजिक सदभावना के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। कोई भी धर्म किसी को भी यह नहीं कहता कि हल्ला मचाकर और चीख़-चिल्ला कर उसका प्रचार करे । धर्म तो शांति हमें शांति का संदेश देता है,शोर का नहीं। हाँ अगर किसी को धर्म प्रचार के लिए इस यंत्र का इस्तेमाल बहुत जरूरी लगता है तो वह अपने उस धर्म -स्थल के परिसर के भीतर करे । लेकिन कर्णभेदी शोर तो न मचाए।
क्या किसी भी धर्म के प्राचीन ग्रंथों में लाउड स्पीकर का उल्लेख है ?अगर नहीं तो फिर आधुनिक युग में इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने की ज़रूरत ही क्या है ? क्या इस ध्वनि – मशीन के बिना आपका कोई धार्मिक काम नहीं चल सकता? आप चाहे इस धर्म के हों या उस धर्म के,कृपया बताएं कि अपने आराध्य के कानों में अपनी बात डालने के लिए इस मशीन के माध्यम से कर्ण भेदी शोर मचाना आपको क्यों बहुत जरूरी लगता है?
क्या आप नहीं जानते कि जब लाऊडस्पीकर का आविष्कार नहीं हुआ था,तब भी यह दुनिया कायम थी? ज़रा सोचिए!धार्मिक कार्यक्रम तो उस ज़माने में भी होते थे। तब उन दिनों धर्म स्थलों से धार्मिक संदेश कैसे प्रसारित किए जाते थे? यानी उस युग में लाऊड स्पीकरों के बिना भी काम चल जाता था ,जबकि धार्मिक आयोजन उन दिनों भी होते थे । लाऊडस्पीकरों के बिना भी उन दिनों विभिन्न धर्मों के प्रवर्तक,धर्मगुरु और धर्म प्रचारक , विचारक और कवि अपने संदेश लाखों करोड़ों लोग तक पहुँचा देते थे। उनके संदेशों में धार्मिक उन्माद नहीं ,बल्कि मानवता के कल्याण की भावनाएँ हुआ करती थीं।
गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, ईसा मसीह , पैगम्बर हज़रत मोहम्मद , गुरुनानक देव और संत कबीर , जैसे अनेक युग प्रवर्तक संत महात्मा इसके प्रेरणादायक उदाहरण हैं। आदि शंकराचार्य ने विशाल भारत भूमि पर चारों दिशाओं में पैदल घूम घूमकर चार मठों की स्थापना की थी ,जिनके प्रचार के लिए उन्हें किसी ध्वनि विस्तारक यंत्र की ज़रूरत नहीं पड़ी , जबकि उनके द्वारा स्थापित ये चारों मठ आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का केन्द्र हैं।
प्राचीन कवियों ने अपने धार्मिक महाकाव्यों को, भजन कीर्तन के संग्रहों को लाऊड स्पीकरों और छपाई मशीनों के बिना भी , उस दौर में जन -जन तक पहुँचाया । धर्म ग्रंथ भी बिना किसी यांत्रिक ध्वनि उपकरण या छपाई मशीन के बिना लाखों ,करोड़ों लोगों तक पहुँचा दिए गए। रामायण ,महाभारत , गीता ,बाइबल और कुरान जैसे पवित्र ग्रंथ किसी लाऊडस्पीकर के बिना भी जन- मानस में आख़िर कैसे छा गए ? ज़रा सोचिए ! जब वेदों की रचना हुई ,तो ये महत्वपूर्ण ग्रंथ उन दिनों किसी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के बिना ,बेहद शांतिपूर्ण तरीके से जन -जन तक कैसे पहुँचे?
आख़िर यह सब कैसे संभव हुआ? लाऊड स्पीकर जैसे ध्वनि विस्तार के आधुनिक यंत्र का आविष्कार मनुष्य ने अपनी सहुलियत के लिए किया है । दूसरों को तकलीफ़ पहुँचाने ,झगड़ा -फ़साद करने ,करवाने या देश और दुनिया के सामाजिक सौहार्द्र को बिगाड़ने के लिए नहीं।
मेरी इन बातों पर ठंडे दिमाग से विचार कीजिए। आपका दिन अच्छा गुज़रेगा और रात को नींद अच्छी आएगी। बशर्ते आपके आस पास कहीं कोई लाउडस्पीकर जोर -जोर से न चीख़ रहा हो।
— स्वराज करुण
यह लेख स्वतंत्र पत्रकार का है ये उनके अपने विचार हैं इससे वेबसाइट का सहमत व जिम्मेदार होना जरूरी नहीं है।

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