सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशीय खण्डपीठ ने गुरुवार को धार में भोजशाला–कमाल मौला परिसर के निकट एक निश्चित खुले स्थान पर मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार की नमाज़ के लिए जाने की अनुमति देने का निर्देश दिया। अदालत ने उस जमीन को खसरा नंबर 596 और रिपोर्टों में दर्गाह भूमि के रूप में चिन्हित किया गया पाया और वह स्थान शुक्रवार 1 बजे से 3 बजे तक पूजा के लिए उपयुक्त बताया।
पीठ में चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमल्ल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन शामिल थे। अदालत ने प्रशासन से कहा कि नमाज़ अदा करने वालों और हिन्दू श्रद्धालुओं के प्रवेश‑निर्गमन के रास्ते अलग रखे जाएँ ताकि कानून‑व्यवस्था की समस्याएँ टली जा सकें और दोनों समुदायों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा हो सके। साथ ही न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि दोनों पक्ष आपसी सहमति से कोई अन्य उपयुक्त स्थान चुनते हैं तो उसे अपनाने में कोई बाधा नहीं है।
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने प्रशासन की अनुपालन संबंधी आपत्तियाँ उठाईं; उनका कहना था कि जिला प्रशासन द्वारा अभी तक उपलब्ध कराई गई जमीन भोजनशाला से लगभग 1.3 किलोमीटर दूर है और वे परिसर के नजदीक ही वैकल्पिक जगह चाहते हैं। मुस्लिम पक्ष ने न्यायालय के समक्ष ज़मीन का नक्शा और स्थान‑संबंधी जानकारी पेश की।
राज्य की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर‑जनरल ने कानून‑व्यवस्था के पहलुओं और सुरक्षा व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए तत्कालीन निर्णय लागू करने में सावधानी की आवश्यकता बतायी। इसके बावज़ूद अदालत ने राज्य को निर्देश दिए कि वह रिपोर्ट में बताए गए दर्गाह‑सम्बंधित खसरा को नमाज़ के लिये उपलब्ध कराये।
पृष्ठभूमि के रूप में ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस परिसर को लेकर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने मई में इसे देवी सरस्वती को समर्पित एक एतिहासिक मंदिर बताया था और इससे जुड़ी कुछ पुरातात्विक छूटों को चुनौती दी गयी थीं; यह मुक़दमा और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ बाद में उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष चलती रही हैं।
संपन्न सुनवाई में न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन तथा वैकल्पिक स्थानों के योग और प्रशासनिक सुरक्षा‑प्रबंधों पर आगे की कार्यवाही पर निगरानी बनी रहेगी।
