सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने बुधवार को उन राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को छह सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है जिनसे जनहित याचिका के प्रति प्रतिक्रिया नहीं मिली है। यह सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की निगरानी वाली पीठ कर रही थी।
यह याचिका अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर की गई है और इसमें कहा गया है कि उपभोक्ताओं को वस्तुओं व सेवाओं की गुणवत्ता, शुद्धता और प्रमाणन के साथ-साथ वितरक, विक्रेता और दुकानदारों के विवरण जानने का अधिकार होना चाहिए, ताकि उन्हें आश्वस्त और सूचित निर्णय लेने तथा शिकायतों के समाधान के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध रहे।
याचिका में केंद्र और राज्यों से यह निर्देश भी मांगा गया है कि हर विक्रेता, वितरक और दुकानदार अपनी दुकान के प्रवेश द्वार पर स्पष्ट और बड़े अक्षरों में अपना नाम, पता, संपर्क नंबर, पंजीकरण संबंधी विवरण और कर्मचारियों की संख्या प्रदर्शित करें, ताकि उपभोक्ता किसी उत्पाद या सेवा में समस्या होने पर त्वरित संपर्क और शिकायत प्रक्रिया अपनाने में सक्षम हों।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने न्यायालय को बताया कि अब तक केवल कुछ राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों — हरियाणा, पंजाब, बिहार, असम और अंडमान व निकोबार द्वीप समूह — ने ही जवाब दाखिल किया है। इस कारण पीठ ने उन उत्तरदाताओं को छह सप्ताह का समय दिया, और आगे की सुनवाई तीन महीने बाद के लिए टाल दी।
याचिका का तर्क है कि ‘‘राइट टू नो’’ उपभोक्ताओं को धोखाधड़ी, भ्रामक प्रस्तुति या बिक्री के बाद सेवा से बचने जैसी परिस्थितियों से बचने में मदद करेगा और समान्यत: उपभोक्ता संरक्षण को सुदृढ़ करेगा। न्यायिक आदेश में अभी तक किसी निस्तारण या निर्देश की अंतिम रूपरेखा तय नहीं की गई है; अगली सुनवाई में प्राप्त उत्तरों व दलीलों के आधार पर आगे का निर्देश दिया जाएगा।

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