निर्देशक व्यासख की 'ख़लीफ़ा' को समकालीन मलयालम एक्शन परंपरा में बहु-आयामी दर्शक अपेक्षाओं के साथ रखा गया था, लेकिन शुरुआती साहसिक दृश्यों के बाद फिल्म को सकारात्मक चाल नहीं मिली। समीक्षाओं के अनुसार, फिल्म की निर्माण-शैली और सेटिंग्स महंगी और भव्य हैं; थारावाडु और कथित तस्करी साम्राज्य का दृश्यांकन भव्य दिखता है। वहीं आलोचना का मुख्य केंद्र पटकथा और निर्देशन रहे हैं — कई समीक्षाएँ बताती हैं कि लेखक जिनू वी अब्राहम की कहानी सतही लगी और व्यासख का निर्देशन कहानी में गहराई नहीं ला पाया।

फिल्म के कुछ एक्शन अनुक्रम, विशेषकर हीरो-परिचय संघर्ष, तकनीकी रूप से प्रभावशाली बताए गए हैं और प्रदर्शन में प्रमुख अभिनेता प्रिथ्विराज सूकुमारन की शारीरिक क्षमता और स्टंट निष्पादन की तारीफ हुई है। इसके बावजूद समीक्षकों ने किरदारों को सपाट और संवादों/घटनाओं को नवाचारहीन बताया; पारिवारिक पलों और रोमांस को पहले देखे गए ढाँचे जैसा करार दिया गया।

एक और दोहरायी गई आलोचना स्थानीय बोली-भाषा के असंगत प्रयोग को लेकर रही — फिल्म मालाबार पृष्ठभूमि पर सेट होने के बावजूद कई पात्रों की अभिव्यक्ति में क्षेत्रीय बोली निरन्तरता नहीं दिखी। समीक्षकों ने इसे कथन सच्चाई व विश्वसनीयता में कमी का कारण माना।

कुल मिलाकर, समीक्षकों का मानना है कि 'ख़लीफ़ा' तकनीकी रूप से भव्य और कुछ स्टंट अनुक्रमों में सफल है, पर फिल्म का लेखन, चरित्र विकास और भावनात्मक अंत:कथा उसे समग्र तौर पर कमजोर कर देती है।

संदर्भ स्रोतIndian Express EntertainmentIndian Express Latest
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