बीते दिनों वंदे मातरम और उसके किस्सों को लेकर चल रही बहस में वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मीला टैगोर ने यह सुझाव दिया था कि राष्ट्रीय गीत के कुछ स्तंभकों को लेकर आरक्षण हैं और कुछ हिस्से ही प्रार्थना के रूप में उपयुक्त माने जा सकते हैं। इस पर भाजपा सांसद और फिल्म अभिनेत्री कंगना रणौत ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी और टैगोर की बातों को सीमित तथा रचनात्मक रूप से संकुचित बताया।
कंगना ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर शर्मीला के बयान का वीडियो साझा कर के यह तर्क रखा कि कविता और गीत में रूपक और कल्पना के माध्यम से भाव जगाए जाते हैं, इसलिए वंदे मातरम को सिर्फ धार्मिक अभ्यास तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में गीत की प्रेरक भूमिका और शास्त्रीय दृष्टियों से 'शक्ति' की व्याख्या का उल्लेख करते हुए समुदायवादी मानसिकता से ऊपर उठने का आह्वान किया।
यह विवाद कांग्रेस के उस फैसले के आसपास उभरा है जिसमें पार्टी ने 1937 के अपने प्रस्ताव के अनुरूप पारंपरिक रूप से वंदे मातरम के केवल पहले दो अंतरों का गायन करने का निर्णय अपनाने की बात कही थी। कांग्रेस नेताओं ने इस निर्णय का ऐतिहासिक संदर्भ दिया और कहा कि पार्टी उसी नीति का पालन कर रही है।
मामले ने राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस को फिर सक्रिय किया है — जहां एक तरफ कलाकारों और सार्वजनिक हस्तियों के बीच धारणाओं पर मतभेद देखे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनीतिक दलों द्वारा ऐतिहासिक रुझानों और प्रथाओं का उल्लेख कर नीतिगत रुख स्पष्ट किया जा रहा है।

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