सड़क परिवहन व राजमार्ग मंत्री ने संसद में दी गई लिखित जानकारी में कहा कि पेट्रोल में 20% एथेनॉल (E20) के कारण वाहन वर्ग तथा उनकी उम्र के अनुसार ईंधन की किफायती माइलेज 2 से 6 प्रतिशत तक घट सकती है। वहीं, वहीँ उन्होंने इस मिश्रण पर किए गए डायनेमोमीटर व सड़क-पर्यवेक्षण परीक्षणों में व्यापक इंजन विफलता या टूट-फूट के प्रमाण नहीं मिलने की बात भी दर्ज कराई।
सरकार के बयान के अनुसार, E20 के तुलनात्मक लाभों में बेहतर एक्सेलेरेशन, सवारी के अनुभव में सुधार और E10 की तुलना में करीब 30% कम कार्बन उत्सर्जन शामिल हैं। इस ईंधन व्यवहार्यताओं पर बातचीत और परीक्षण ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) के संयुक्त अध्ययन के जरिए किए गए। अध्ययन में BS-III, BS-IV और BS-VI मानक वाले E10 पर आधारित दो-पहिया व चार-पहिया वाहनों के लिए मानक एवं OEM-निर्मित अनुकूलित परीक्षण प्रोटोकॉल अपनाए गए।
सरकारी सामग्री यह भी बताती है कि ईथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम क्रमिक व परामर्शी प्रक्रिया के तहत लागू किया गया—इस प्रक्रिया में NITI Aayog, वाहन निर्माताओं, तेल विपणन कंपनियों और तकनीकी संस्थान शामिल रहे। नीति के इतिहास के रूप में बताया गया कि पायलट 2001 में शुरू हुआ, E5 को 2006 में लागू किया गया और 2013-14 में समग्र ब्लेंडिंग करीब 1.53% थी, जो बाद में बढ़ाई गई।
सरकार ने यह आंकड़ा भी साझा किया कि E15+ पिछले ढाई-तीन वर्षों से व्यापक उपयोग में रहा है और E19–E20 blends पिछले लगभग ढाई वर्षों से लागू हैं; 20 करोड़ से अधिक दोपहिया एवं 3 करोड़ से अधिक पेट्रोल कारें इन मिश्रणों पर चल रही हैं, जबकि व्यापक इंजन विफलता के प्रमाण नहीं मिले।
वहीं, विरोधी दलों और उपभोक्ता समूहों ने पुराने वाहन और संगतता, संभावित माइलेज गिरावट, बढ़ी हुई मरम्मत लागत और देयता के मुद्दे उठाए हैं। सरकार और उद्योग ने कहा है कि निर्माताएँ E20 वाले वाहनों की वारंटी दावों को मानती रहती हैं। पारदर्शिता व उपभोक्ता सुरक्षा से जुड़े सवालों पर चर्चा जारी है।

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