दिल्ली उच्च न्यायालय ने 29 जुलाई, 2026 को मानव पैपिलोमा वायरस (HPV) टीकाकरण अभियान को तुरंत रोके जाने की मांग खारिज कर दी। बेंच में मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया ने सुनवाई की और कहा कि पेश किए गए आंकड़ों से ऐसी कोई तात्कालिक क्षति स्पष्ट नहीं हुई जो टीकाकरण रोकने का तात्कालिक आधार दे।
केंद्र ने अदालत को बताया कि फरवरी में शुरू किए गए अभियान के अंतर्गत अब तक लगभग 55 लाख–56 लाख डोज़ दी जा चुकी हैं और जुलाई 25 तक 120 रिपोर्ट की गईं जो टीकाकरण के बाद की घटनाओं (AEFI) के तौर पर दर्ज हैं। इन मामलों में से 42 घटनाओं को अधिक गंभीरता के रूप में चिन्हित किया गया, जबकि किसी भी मामले में मृत्यु की सूचना नहीं दी गई। सरकार पक्ष से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने यह डेटा अदालत के समक्ष रखा।
याचिका चिकित्सक डॉ. सुजाता मित्तल और स्वास्थ्य उद्यमी जितेंद्र चौकसे द्वारा दायर की गई थी, जिसमें वैक्सीन की दीर्घकालिक सुरक्षा, पारितोषिक सहमति (informed consent) और प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी पर आपत्तियां उठाई गईं। याचिकाकर्ताओं ने पिछले वर्षों में टीके से जुड़े मामलों का हवाला भी दिया था ताकि सुरक्षा संबंधी चिंताओं को रेखांकित किया जा सके।
अदालत ने मामले की गंभीरता स्वीकार की और कहा कि नई दवाइयों या टीकों के परिचय में आवश्यक प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। न्यायालय ने केंद्र को याचिका पर प्रतिक्रिया देने का निर्देश दिया; अगली सुनवाई से पहले औपचारिक जवाब दाखिल करने को कहा गया।
न्यायालय ने फिलहाल टीकाकरण तत्काल रोकने का आदेश नहीं दिया, पर यह स्पष्ट किया कि नियमों और निगरानी प्रथाओं की पालना पर कड़ा ध्यान दिया जाएगा। सरकार के अनुसार अभियान का लक्ष्य 14 वर्षीय लड़कियों को लक्षित करना है और यह फरवरी में देशभर में लागू किया गया था।
अदालत में आगे की दलीलों और केंद्र के जवाब का अवलोकन करके मामले की अगली कानूनी राह तय होगी।

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