बाजार नियामक Securities and Exchange Board of India (SEBI) ने जुलाई के अंत में IDBI बैंक को दिया एक अनौपचारिक मार्गदर्शन सार्वजनिक किया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि मौजूदा शेयरधारक द्वारा निजी रूप से वार्ता कर के बेचे गए गैर‑लिस्टेड इक्विटी शेयर को स्वचालित रूप से 'पब्लिक इश्यू' नहीं माना जाएगा, बशर्ते कि वित्त वर्ष में खरीदारों की संख्या वैधानिक सीमा 200 को पार न करे।

नियामक ने इस तरह के लेन‑देनों को उस कंपनी द्वारा किए गए नए ऑफर के रूप में नहीं देखा, बल्कि मौजूदा हिस्सेदारी के सेकेंडरी ट्रांसफर के रूप में स्वीकार किया है। इसका मतलब है कि सार्वजनिक निर्गमन संबंधी प्रक्रियाएँ उस स्थिति में लागू नहीं होंगी, जब तक खरीदार सीमा का पालन हो रहा हो।

मार्गदर्शन में यह भी कहा गया है कि प्रमोटर्स को मिले संविदात्मक अधिकारों, जैसे राइट ऑफ फर्स्ट रेफ्यूज (ROFR), को ऐसे यूनिक रूप से व्यवस्थित ऑफ‑मार्केट ट्रांसफर के दौरान बनाए रखा जा सकता है। इस बिंदु पर SEBI ने कंपनी क़ानून से जुड़ी प्रावधानों को भी देखा और नोट किया कि कंपनियों के निजी प्लेसमेंट पर संख्या‑सीमा है, लेकिन किसी विशिष्ट श्रेणी को लक्षित करने की बाध्यता नहीं है।

इसके अतिरिक्त, नियामक ने यह स्पष्ट किया कि QIBs (क्वालिफाइड इंस्टिट्यूशनल बायर) को निजी प्लेसमेंट संख्याओं के हिसाब से अलग रखा जा सकता है; यानी गणना करते समय QIB को बाहर रखा जा सकता है, जिससे गैर‑QIB निवेशकों को लक्षित कर के भी हस्तांतरण संभव हैं जब तक कुल खरीदार 200 तक ही रहे।

IDBI बैंक ने मई में SEBI से यह स्पष्टता मांगी थी कि उसके प्रस्तावित अनलिस्टेड निवेशों की निपटान पद्धति किस प्रकार विधिसम्मत मानी जाएगी। नियामक का यह अनौपचारिक पत्र बैंक के प्रश्न का टेक्निकल उत्तर करता है और उन संस्थागत और कॉर्पोरेट विक्रेताओं के लिए रेगुलेटरी दिशा देता है जो ऑफ‑मार्केट रास्ते अपनाते हैं।

संदर्भ स्रोतThe Hindu BusinessEconomic Times Markets
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