सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि एक पायलट परियोजना तैयार की जाए जिसके तहत ईंधन देने से पहले किसी वाहन के वैध थर्ड‑पार्टी बीमा की जांच हो सके। अदालत ने इस संदर्भ में बीमा नियामक और सडक परिवहन मंत्रालय के बीच परामर्श कर के रूपरेखा तैयार करने का निर्देश दिया।
निर्देश का मूल उद्देश्य सड़कों पर बड़ी संख्या में बिना बीमा चल रहे वाहनों की पहचान कराना और मालिकों को आवश्यक बीमा लेने के लिए प्रेरित करना है। अदालत ने तकनीकी साधनों के इस्तेमाल की संभावना पर भी जोर दिया — उदाहरण के तौर पर ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों को वाहन व बीमा डेटाबेस से लिंक करना ताकि अनइंश्योर्ड वाहनों की स्वचालित पहचान हो सके।
इसके साथ ही अदालत ने ऐसे सिस्टम के माध्यम से निषेधात्मक कार्रवाई की रूपरेखा पर भी विचार करने को कहा: यदि डेटाबेस बताता है कि वाहन के पास वैध बीमा नहीं है, तो ईंधन पम्प को उस वाहन को ईंधन देने से रोका जा सके। अदालत ने यह भी कहा कि तकनीक के जरिए अनइंश्योर्ड वाहनों पर स्वत: इलेक्ट्रॉनिक challan जारी करने की व्यवस्था पर भी विचार किया जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि यातायात पुलिस को वास्तविक‑समय में बीमा स्थिति देखने के लिए पोर्टेबल उपकरण या मोबाइल एप्लिकेशन उपलब्ध कराए जाने चाहिए, ताकि सड़क पर भी तुरंत सत्यापन व उल्लंघन पर कार्रवाई संभव हो सके।
साथ ही अदालत ने नए पंजीकृत निजी वाहनों के लिए अनिवार्य थर्ड‑पार्टी बीमा की अवधि बढ़ाने का निर्देश दिया: निजी कारों के लिए अब यह चार साल और दोपहिया वाहनों के लिए छह साल होगी। IRDAI से कहा गया है कि आवश्यक दिशा‑निर्देश तत्काल जारी किए जाएँ।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यह प्रस्तावित व्यवस्था एक पायलट के रूप में आगे बढ़ेगी और संबंधित मंत्रालयों तथा नियामक द्वारा व्यवहारिक पहलुओं, पेट्रोल पम्पों के संचालन पर प्रभाव और तकनीकी समेकन के तरीकों का परीक्षण किया जाएगा।

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