8 लाख करोड़ से अधिक शेयर पानी में बह गये
चर्चा है कि बीते दो दिनों में भारतीय निवेशकों के शेयर बाजार में साढ़े आठ लाख करोड़ पानी में बह गये है। कारण यह है कि सरकार की अर्थव्यवस्था सुधान में न तो कोई नीति है और न ही कोई ऐसी योजना जिससे भारतीय उद्योग को उम्मीद लगे। देश के बड़े बड़े उद्योगों के शेयर भारी नुकसान में चल रहे है। पिछले चार छह माह में शेयर बाजार बुरी तहर टूट रहा है। उत्पादन इकाइयों में भी घाटा चल रहा है। मार्केट में खरीदार नही है उत्पाद बना कर भी व्यापारियों को घाटा हो रहा है। देश की नामचीन कंपनियों के शेयर लगातार गिरते जा रहे है। इन्हीं उद्योगों के भरोसे ही सरकार की अर्थव्यवस्था टिकी रहती है। सरकार अर्थव्यवस्था सुधारने के लिये कोई सुनियोजित योजना नहीं बना पा रही है। मोदी सरकार की विदेश नीति भी सफल नहीं दिखती है।आस पास के देशों नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश से भी भारत से अच्छे रिश्ते हैं। पाकिस्तान का इस्तेमाल तो देशवासियों के मन में मुस्लिम समुदाय को निशाने पर रखने के लिये किया जाता है।
यूपीआई पर टैक्स को लेकर जनता में रोष
2014 में जब से केन्द्र में पीएम मोदी ने कमान संभाली तभी से सरकार ने आन लाइन पेमेंट करने पर जोर दिया। यह दबाव बनाया गया कि आमजीवन में लोग अधिक से अधिक लोग आनलाइन भुगतान करें। आज के समय में काफी संख्या में लोग यूपीआई पर निर्भर हो गये हैं। ऐसे में सरकार ने यह मन बनाया है कि अब यूपीआई से होने वाले भुगतान पर 0.04 टैक्स की वसूली की जायेगी यह अगले माह से लागू कर दिया जायेगा। इस मामले को लेकर इंडिया ब्लाक के सभी दल सरकार पर आर्थिक बोझ डालने का आरोप लगा रहे है। आरोप यह भी है कि सरकार ने पहले तो आम जनता को आनलाइन पेमेंट का दबाव बनाया और जब वो इसके आदी हो गये तो उनसे सरकार टैक्स वसूली का काम कर रही है। आम जनता पर इस नये टैक्स से अतिरिक्त भार पड़ेगा। समूचा विपक्ष पर इस बात का जोर डाल रही है कि सरकार इस नये टैक्स को न लागू करे। सरकार ऐसा इस लिये कर रही है क्योंकि भारत सरकार ने यूएसए के साथ गठजोड़ कर लिया है। ट्रंप के आगे पीएम मोदी बिलकुल नतमस्तक हो गये है। यूपीआई प्रणाली लागू करने के पीछे अमेरिका की दो कंपनियां फोन पे और गूगल का नियंत्रण है। ट्रंप के इशारों पर इन कंपनियां ने भारत सरकार को ऐसा करने पर मजबूर कर दिया है। भारत सरकार ने विश्च बैंक और आइएमएफ से इतना अधिक कर्ज ले लिया है कि उसका ब्याज चुकाने के लिये भी सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा है। सोचने वाली बात यह है कि भारत को यह कर्ज चुकाने के लिये डालर का भुगतान करना पड़ रहा है। अब डालर भारत के रुपये के मुकाबले काफी महंगा है। एक डालर की कीमत लगभग 98 रुपये है।
युवाओं के दबाव में आई केन्द्र की मोदी सरकार
जुलाई में भी सीजेपी ने सरकार की मनमानी के खिलाफ जंतर मंतर पर आंदोलन किया था। शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ही वो आंदोलन खत्म किया था। दूसरी ओर विपक्ष की एकजुटता भी मोदी सरकार के लिये संकट पैदा कर रही है। समूचा इंडिया ब्लाक व विपक्ष ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी और मोदी सरकार के निकम्मेपन को लेकर आंदोलन करता दिख रहा है। इसके आलावा देश का हर वर्ग सरकार की कार्यप्रणाली और नीतियों को लेकर आंदोलन कर रहा है चाहे वो बेरोजगारी का मामला हो, सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार का मुद्दा हो या नीट परीक्षा पेपर लीक का मामला। सरकार का उदासीन रवैया सबकी आंखों में खटक रहा है। मोदी सरकार के 12 सालों की कार्यप्रणाली से जनता ऊब गयी है जुमलेबाजी से जनता का मोह खत्म हो गया है।
चुनाव आयोग की कारगुजारियों से जनता और विपक्ष में रोष
गोंचुनाव आयोग की मनमानी और सत्तारूढ़ दल की मिलीभगत को लेकर विपक्ष काफी समय से शिकायत कर रहा है लेकिन न तो चुनाव आयोग उनकी बात सुन रहा है और न ही अदालत में उनकी फरियाद सुनी जाती है। यह आरोप लगता है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग सत्तारूढ़ दल के साथ हैं। या स्वार्थवश सत्ता के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे है। वर्तमान सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन चल रहे हैं। सत्ताधीशों ने पिछले 12 सालों में सभी संवैधानिक पदों पर ऐसे लोगों को बैठा दिया जो कि उनकी सोच के समर्थक हैं। सरकार की पूरी कोशिश है कि वो अदालतों में भी संघ और भाजपा की सोच वाले वकीलों को न्यायपालिका में शामिल करा दें। लेकिन कॉलोजियम के आगे उनकी चल रही पा रही है। इसके बावजूद न्यायपालिका में बहुत सारे लोग न्यायपालिका में घुसने में सफल हो गये है। चुनाव आयोग कार्यप्रणाली पर विपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि चुनाव आयोग में भाजपा समर्थक अधिकारियों को आयुक्तों को तैनात कर दिया है जो सरकार के इशारों पर काम कर रहे है। इंडिनयन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने चुनाव आयोग में हो रहे घोटालों का खुलासा किया है उस रिपोर्ट में बताया गया है कि किस तरह सरकार के इशारों पर एसआईआर के जरिये देश के 13 करोड़ लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया। इस रिपोट के छपने के बाद से देश भर में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष और देशवासियों के निशाने पर आ गये हैं। जनता आंदोलन कर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और गिरफ्तारी की मांग कर रही है।
8 लाख करोड़ से अधिक शेयर बाजार में डूबी
चर्चा है कि बीते दो दिनों में भारतीय निवेशकों के शेयर बाजार में साढ़े आठ लाख करोड़ पानी में बह गये है। कारण यह है कि सरकार की अर्थव्यवस्था सुधान में न तो कोई नीति है और न ही कोई ऐसी योजना जिससे भारतीय उद्योग को उम्मीद लगे। देश के बड़े बड़े उद्योगों के शेयर भारी नुकसान में चल रहे है। पिछले चार छह माह में शेयर बाजार बुरी तहर टूट रहा है। उत्पादन इकाइयों में भी घाटा चल रहा है। मार्केट में खरीदार नही है उत्पाद बना कर भी व्यापारियों को घाटा हो रहा है। देश की नामचीन कंपनियों के शेयर लगातार गिरते जा रहे है। इन्हीं उद्योगों के भरोसे ही सरकार की अर्थव्यवस्था टिकी रहती है। सरकार अर्थव्यवस्था सुधारने के लिये कोई सुनियोजित योजना नहीं बना पा रही है। मोदी सरकार की विदेश नीति भी सफल नहीं दिखती है।आस पास के देशों नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश से भी भारत से अच्छे रिश्ते हैं। पाकिस्तान का इस्तेमाल तो देशवासियों के मन में मुस्लिम समुदाय को निशाने पर रखने के लिये किया जाता है।
यूपीआई पर टैक्स को लेकर जनता में रोष
2014 में जब से केन्द्र में पीएम मोदी ने कमान संभाली तभी से सरकार ने आन लाइन पेमेंट करने पर जोर दिया। यह दबाव बनाया गया कि आमजीवन में लोग अधिक से अधिक लोग आनलाइन भुगतान करें। आज के समय में काफी संख्या में लोग यूपीआई पर निर्भर हो गये हैं। ऐसे में सरकार ने यह मन बनाया है कि अब यूपीआई से होने वाले भुगतान पर 0.04 टैक्स की वसूली की जायेगी यह अगले माह से लागू कर दिया जायेगा। इस मामले को लेकर इंडिया ब्लाक के सभी दल सरकार पर आर्थिक बोझ डालने का आरोप लगा रहे है। आरोप यह भी है कि सरकार ने पहले तो आम जनता को आनलाइन पेमेंट का दबाव बनाया और जब वो इसके आदी हो गये तो उनसे सरकार टैक्स वसूली का काम कर रही है। आम जनता पर इस नये टैक्स से अतिरिक्त भार पड़ेगा। समूचा विपक्ष पर इस बात का जोर डाल रही है कि सरकार इस नये टैक्स को न लागू करे। सरकार ऐसा इस लिये कर रही है क्योंकि भारत सरकार ने यूएसए के साथ गठजोड़ कर लिया है। ट्रंप के आगे पीएम मोदी बिलकुल नतमस्तक हो गये है। यूपीआई प्रणाली लागू करने के पीछे अमेरिका की दो कंपनियां फोन पे और गूगल का नियंत्रण है। ट्रंप के इशारों पर इन कंपनियां ने भारत सरकार को ऐसा करने पर मजबूर कर दिया है। भारत सरकार ने विश्च बैंक और आइएमएफ से इतना अधिक कर्ज ले लिया है कि उसका ब्याज चुकाने के लिये भी सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा है। सोचने वाली बात यह है कि भारत को यह कर्ज चुकाने के लिये डालर का भुगतान करना पड़ रहा है। अब डालर भारत के रुपये के मुकाबले काफी महंगा है। एक डालर की कीमत लगभग 98 रुपये है।

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