दिल्ली उच्च न्यायालय ने 13 अगस्त के आदेश में स्पष्ट किया कि वयस्कों के बीच सहमति से रहने का सम्बन्ध कानूनी दृष्टि से विवाह के समान माना जा सकता है और उनके जीवन और निवास के अधिकारों में किसी प्रकार का सामाजिक या पारिवारिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। न्यायमूर्ति सौरभ बैनर्जी ने उस जोड़े को पुलिस सुरक्षा देने का निर्देश दिया जो महिला के परिवार से धमकियों का सामना कर रहा था।

जानकारी के अनुसार युगल दोनों तीस के दशक में हैं, वे कुछ समय से साथ रह रहे थे और आगे विवाह की योजना भी बना रहे थे; पर महिला के पिता और भाई उनके रिश्ते के खिलाफ थे और प्रत्यक्ष या कथित रूप से हिंसा की धमकी दे रहे थे। युगल ने स्थानीय थाना में शिकायत दर्ज कराई थी, किन्तु वहां तदनुसार कार्रवाई नहीं हुई—यही बात अदालत के समक्ष रखी गयी।

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और घरेलू हिंसा से संरक्षण प्रदान करने वाले कानूनों जैसे पोर्शन ऑफ़ वूमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेन्स ऐक्ट, 2005 के प्रावधानों के आलोक में बिना विवाह के रहने के अधिकार को कानूनी मान्यता प्राप्त हुई है। अदालत ने कहा कि सामाजिक रूढियों के आधार पर संवैधानिक मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।

संदर्भ स्रोतHindustan Times DelhiTimes of India Delhi
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