मोदी की तरकीब काम न आयी, यूएस में संघ प्रमुख मोहन भागवत भारी विरोधजब से ट्रंप दूसरी बार यूएसए के प्रेसिडेंट बने हैं तब से उनका रुख भारत के प्रति दिन ब दिन बदलता जा रहा है। एक समय था जब ट्रंप और पीएम मोदी की दोस्ती के किस्से सुनायी देते थे। लेकिन आज दोनों के रिश्तों में खटास देखी जा सकती है। ऐसा कोई भी मौका नहीं जब ट्रंप ने पीएम मोदी को निशाने पर नहीं लिया हो। ट्रंप मोदी पर निजी और भद्दे कमेंट पास करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। ऐसे में चर्चा है कि पीएम मोदी ट्रंंप के सामने जाने से भी कतरा रहे है। भारत में सरकार पर संकट देख पीएम ने संघ प्रमुख को यूएस समेत कई देशों में व्यापार और छवि सुधारने को भेजा है। लेकिन यूएस में जिस तरह संध प्रमुख भागवत का विरोध हुआ है उससे अच्छे परिणाम के आने की उम्मीद कम हैं। मेडिसन स्क्ववायर पर भागवत का कार्यक्रम तय था वहां उनको विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा, जिसकी उन्हेंउम्मीद नहीं थी। उन्हें लगा था कि यूएस में उनका भव्य स्वागत होगा। लेकिन आयोजन स्थल पर कुछ मुस्लिम संगठनों के अलावा ईसाई समुदायों के लोगों का गुस्सा झेलना पड़ा। दूसरी ओर न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने भी इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं किया। न्यूयार्क में ममदानी ऐसे पहले मुस्लिम समुदाय के भारतीय मूल के व्यक्ति हैं। भारत में पिछले दस सालों जिस तरह से अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। उन पर हिंसा और सांप्रदायिक वारदातें की जा रही है। केन्द्र राज्यों की सरकारें जिस तरह हर बात में अल्पसंख्यको के साथ पक्षपात रवैया अपना रही हैं। उसका असर यूएस में मोहन भागवत के कार्यक्रम पर देखने को मिला है।चर्च और मस्जिदों पर सत्ता समर्थकों का हंगामा और हिंसापिछले पांच सात सालों में यह देखने को मिला है किसी भी त्यौहार पर हिन्दू संगठन और सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता भाजपा शासित राज्यों में अल्पसंख्यकों के पूजा स्थलों पर जा कर गाली गलौच, मारपीट, महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियां करने के साथ आगजनी करने से बाज नहीं आते हैं। ऐसे में स्थानीय पुलिस की भूमिका निंदनीय रही है। पुलिस पर यह आरोप लगता है कि वो सत्ता समर्थकों पर सरकार के दबाव मे कोई सख्त कार्रवाई नहीं करते है। न्याय व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। अल्पसंख्यक संबंधी मामले में जांच पड़ताल के ही उसे मु​जरिम मान लिया जाता है। आज के समय में ऐसे मामले पूरी दुनिया में आसानी से पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि भारत की छवि दूरदराज देशों में खराब हो रही है। इसका खामियाजा भी संघ प्रमुख मोहन भागवत और पीएम मोदी को उठाना पड़ रहा है।चले तो छब्बे जी बनने दूबे जी भी न रहेमोदी सरकार को संकट में देखते हुए संघ प्रमुख भागवत ने भी उन युवाओं के साथ संवाद करने प्रयास किया है जो मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल हुए हैं। उन्होंने संवाद के दौरान युवाओं को यह एहसास कराने का प्रयास किया कि वो सरकार की कार्य प्रणाली के खिलाफ हैं। लेकिन अपने प्रयास में वो कितना सफल हए ये तो नहीं पता लेकिन अब उन्हें भी युवाओं की समस्याओं और बेरोजगारी की चिंता होने लगी है। पिछले कई सालों से युवा शिक्षा में भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और पेपरलीक का मुद्दा उठा रहे थे न तो सरकार उनकी बात सुन रही थी और न संघ प्रमुख मोहन भागवत। जब मामला हाथ से निकल गया तो मोहन भागवत को सरकार के बचाव में आगे कर दिया गया। ये बात तो साफ है कि जिस ऐश ओ आराम की जिंदगी मोहन भागवत रहे हैं। वो मोदी सरकार की वजह से है अगर सरकार पर संकट आता है तो संकट उनके रहन सहन पर भी होगा। दिखावे के लिये संघ प्रमुख सरकार पर छोटे मोटे हमले करते दिख जाते हैं ताकि लोग यह समझे कि संघ और सरकार के बीच मतभेद है। जबकि वास्तविकता तो यह है कि दोनों ही एक थैली के चट्टे बट्टे हैं।
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