एक अनुक्रम बनाते हुए, मामले की पृष्ठभूमि यह है कि JioStar India Pvt Ltd ने 2014 और 2015 में दिल्ली उच्च न्यायालय में TRAI के टेलिविज़न चैनल‑प्राइसिंग ढाँचे के कुछ हिस्सों को चुनौती दी थीं। बाद में वही विवाद उच्च न्यायालय से सुप्रीम कोर्ट और टीडीएसएटी के समक्ष उठे, जिससे विवादित प्रक्रियाएं कई मंचों पर लंबित रहीं।
4 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ — मुख्य न्यायाधीश सुर्या कांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना — ने JioStar की उस विधिक याचिका पर सुनवाई की जिसमें कंपनी ने कहा था कि वह अपने दिल्ली HC के पेंडिंग पिटिशन में संशोधन नहीं करना चाहती। न्यायालय ने निपटारे के समय JioStar से कहा कि वह उच्च न्यायालय में जाकर आवश्यक आवेदन करे; इसके बाद शीर्ष अदालत ने ट्रांसफर याचिका निरस्त कर दी।
सुनवाई में JioStar की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी पेश थे; कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में Karanjawala & Co. के माध्यम से पैरवी कराई। बहस का केंद्र TRAI के नियमों और टैरिफ ऑर्डर्स के बीच वैधानिक तथा प्रशासनिक प्रकृति का विभाजन था। अधिवक्ता ने कहा कि नियमों को अवंटित विधायी शक्ति के रूप में हाई कोर्ट के समक्ष चुनौती दी जानी चाहिए, जबकि टैरिफ ऑर्डर्स प्रशासनिक आदेश होने से TDSAT के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
विभिन्न पक्षों ने यह भी उठाया कि फ्रेमवर्क में “सब्सक्राइबर” की परिभाषा से लक्जरी होटलों जैसे व्यावसायिक उपभोक्ताओं और सामान्य आवासीय घरों के बीच भेद नहीं हो रहा, जिससे मूल्य निर्धारण में असमानता पैदा हो सकती है। JioStar ने दलील दी कि उच्च न्यायालय ने पहले याचिकाओं में संशोधन का निर्देश देते हुए लागत (कोस्ट) भी लगाई, जबकि उनका मानना था कि संशोधन आवश्यक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया‑आधारित समाधान सुझाया: कंपनी को दिल्ली उच्च न्यायालय में जाकर स्पष्ट करना चाहिए कि वह संशोधन नहीं चाहती और वहीं से आगे की चुनौती जारी रखनी चाहिए; JioStar ने शीर्ष अदालत में ट्रांसफर याचिका वापस लेने का संकेत दिया और आवश्यक आवेदन उच्च न्यायालय में दायर करने की तैयारी की जानकारी दी।

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