सरकार भले ही धीरे-धीरे लॉकडाउन खोलने की शुरुआत कर रही हो लेकिन उद्योग अभी भी पूरी क्षमता से काम करने के न तो हक में हैं और न ही उन्हें मजदूर मिल पा रहे हैं। उद्योगजगत के प्रतिनिधियों का मानना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए उत्पादन सामान्य होने में कम से कम छह माह का समय लगना तय है। इंडिया एसएमई फोरम की महासचिव सुषमा मोरथानिया ने हिन्दुस्तान से बातचीत में बताया कि मांग की कमी के चलते इंडस्ट्री फिलहाल उत्पादन बेहद कम है। उन्होंने कहा वैसे तो लॉकडाउन के नियमों के हिसाब से अभी काफी कम क्षमता से काम हो रहा है, आने वाले दिनों में हालात सामान्य हुए तो भी मजदूरों के संकट से फिलहाल पूरी क्षमता से काम शुरू होने के आसार नहीं हैं।
स्थानीय मजदूरों पर ही निर्भर रहना होगा
सुषमा के मुताबिक शहरों से गांव लौट चुके मजदूर अब दीपावली और छठ पूजा से पहले शहरों की तरफ वापस लौटने का रुख नहीं शुरू करेंगे। ऐसे में नवंबर-दिसंबर तक उद्योग जगत को आधे या फिर 75%उत्पादन के साथ ही फैक्ट्रियां शुरू करनी पड़ेंगी। इसके लिए स्थानीय मजदूरों पर ही निर्भर रहना होगा। कारोबारी अगर 100% क्षमता के आधार पर उत्पादन शुरू करता है तो उसका माल फंसने की आशंका बढ़ गई है। क्योंकि देश में न तो मांग पहले के मुकाबले बढ़ रही है और न ही सप्लाई चेन दुरुस्त है कि एक्सपोर्ट ही प्रभावी तौर पर शुरू किया जा सके।
मजदूरों की मुश्किल के चलते कई उद्योग पहले से ही सुस्त
इसके अलावा नॉर्दर्न इंडिया शिपर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और एक्सपोर्ट के कामकाज से जुड़े टीएस अहलूवालिया ने हिन्दुस्तान को बताया कि घरेलू और विदेशी मांग में देखी जा रही कमी के चलते कारोबारियों को हमारी तरफ से यही सुझाव है कि वो पूरी क्षमता से काम न करें। उन्होंने कहा कि मजदूरों की मुश्किल के चलते कई उद्योग पहले से ही सुस्त पड़े हैं वहीं जहां कहीं काम चल भी रहा है वहां पर लॉकडाउन की बंदिशों और औजारों को सैनेटाइज करते रहने की वजह से लंबा समय बेकार चला जाता है। दिनभर के मौजूदा कुल कामकाजी घंटों में से 25-30 फीसदी समय इन्हीं कामों में खर्च हो जाता है, जिससे उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होने लगा है।







