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विनोद बंसल
बजट का शब्द सुनते ही मन में एक ही बात आती है कि यह भविष्य के अर्थ-प्रबंधन का एक खाका होगा। आगे आने वाले समय में क्या आय-व्यय होगा तथा किस मद पर कितना व्यय करने का लक्ष्य रखा जाएगा यह सब उसमें विस्तार से वर्णित होता है। देश के समेकित विकास हेतु, विविध समुदायों के निर्बल वर्ग के विकास हेतु क्या कदम उठाए जाएं, इस हेतु भी सरकारों द्वारा घोषणाएं बजट में की जाती हैं। अर्थव्यवस्था के विविध आयामों के साथ साथ सामरिक, सामाजिक व सांस्कृतिक उत्थान हेतु भी वित्त प्रबंधन किया जाता है। अर्थात आगामी वर्ष में देश कहाँ से कहाँ तक पहुंचना है, उसका आर्थिक खाका बजट के माध्यम से सरकारें प्रतिवर्ष संसद के पटल पर रखती हैं।
हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो एक पंथ-निरपेक्ष संविधान द्वारा संचालित है। इसके अंतर्गत राज्य अपने नागरिकों के बीच जाति, मत-पंथ या सांप्रदायिक आधार पर भेद-भाव नहीं कर सकता। किन्तु दुर्भाग्य से काँग्रेस शासन काल में इन सभी संवैधानिक प्रावधानों को चुनौती देते हुए बजट को भी मुस्लिम तुष्टीकरण का हथियार बना दिया गया था। इसकी कुछ बानगी देखिए..
इससे पूर्व तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा 29 जनवरी, 2006 को अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों अर्थात् मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिक्ख, पारसियों तथा जैनों से संबंधित मामलों पर बल देने के लिए केंद्र सरकार ने एक अलग अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का गठन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय में से किया। कहने को तो इसमें 6 समुदायों का सम्मिश्रण है किन्तु इसकी अधिकांश नीतियाँ व उनके सर्वाधिक लाभार्थी मुस्लिम समुदाय ही है। इसी मंत्रालय के अधीन बने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग तथा देश भर में खुली इसकी राज्य शाखाएं आज भी बहु-संख्यकों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। क्योंकि इन आयोगों के बल पर कुछ समाजकंटक हिन्दू समाज को डराने धमकाने तथा उनके उत्पीड़न में लगे हैं। अनेक बार शिकायतों के बावजूद आयोग ना तो जिहादियों पर शिकंजा कसता है और ना ही पीड़ित गैर-अल्पसंख्यकों को कोई राहत ही देता है। तब उन्हें लगता है कि एक राष्ट्रीय बहुसंख्यक आयोग भी होना चाहिए।
जहां पिछले बजट भाषणों में बार-बार अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग किया जाता था इस बार के बजट-2022 में “अल्पसंख्यक” शब्द ढूँढने से भी नहीं मिला। शायद इसीलिए कि वर्तमान केंद्र सरकार यह जानती है कि हमारी सभी विकास व रोजगार परक नीतियों का लाभ जब सभी को मिलने वाला है तो वे फिर चाहे अल्पसंख्यक हों या बहु-संख्यक क्या फर्क पड़ता है। वैसे भी सरकार का नारा “सबका साथ – सबका विकास – सबका विश्वास” है। अल्पसंख्यकों के लिए बजट में अलग प्रावधान कहीं ना कहीं देश में अलगाववाद को ही प्रोत्साहित करता है। जब-जब सरकारी नीतियाँ सांप्रदायिक आधार पर बनीं तब-तब देश के विभाजन की नींव रखी गई।








