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अहमदशाह अब्दाली के सामने इब्राहिम गर्दी लाया गया। अहमदशाह ने पूछा-‘तुम मराठों की दस पल्टनों के जनरल थे ? उससे पहले तुम फ्रांसीसियों के नौकर थे ? तुमने फिरंगी ज़बान भी पढ़ी है ?
गार्दी नें जवाब दिया ‘जी हां।’
मुसलमान होकर फिरंगी ज़बान पढ़ी! फिर मराठों की नौकरी की!!
क्या तुम नमाज़ पढ़ते हो ?
हमेशा; पांचों वक्त ।
अहमदशाह के चेहरे पर व्यंग भरी मुस्कराहट आई और आँखों में वध की क्रूरता। बोला, ‘फिरंगी या मराठी ज़बान में नमाज़ पढ़ते होगे ! खुदा को राम कहते होगे !’
इब्राहिम ने घावों की पीड़ा दबाते हुये कहा, ‘क्या खुदा अरबी, फ़ारसी या पश्तो ज़बानों को ही समझता है ? क्या वह मराठी या फ्रांसीसी को नहीं जानता ? क्या राम खुदा नहीं है और क्या खुदा राम नहीं है ?’
अब्दाली बोला, ‘क्यों कुफ्र बकता है ? तोबा कर; नहीं तो टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायेंगे।’ और अब्दाली ने उसके टुकड़े टुकड़े करके वध करने की आज्ञा दी।

ये कहानी शायद क्लास viii में पढ़ी थी लेकिन आज फिर ये कहानी प्रासंगिक हो गयी जब “आज का अब्दाली” एक माइक लेकर हल्दीराम के रिटेल आउटलेट पर जाता है और नवरात्रि के व्रत में इस्तेमाल किये जाने वाले किसी फ़ूड प्रॉडक्ट के पैकेट पर हिंदी, अंग्रेज़ी के साथ उर्दू में डिटेल लिखे जाने का विरोध करता है, और फिर सोशल मीडिया के अब्दाली ‘बायकॉट हल्दीराम’ का उद्घोष करते हुए लिपि की तलवार से भाषा की हत्या करने में भूल गये कि भाषा का नाम तो हिंदी ही है, जाहे वह किसी लिपि में लिखी जाए, क्योंकि जायसी अपनी अवधी फ़ारसी लिपि में लिखते थे और तुलसी अपनी अवधी नागरी लिपि में।
मेरे पुरखों में ग़ालिब और मीर के साथ सूर, तुलसी और कबीर के नाम भी आते हैं। लिपि के झगड़े में मैं अपनी विरासत और अपनी आत्मा को कैसे भूल जाऊँ न मैं एक लिपि की तलवार से अपने पुरखों का गला काटने को तैयार हूँ और न मैं किसी को ये हक़ देता हूँ कि वह दूसरी लिपि की तलवार से मीर, ग़ालिब और अनीस के गर्दन काटे। आप खुद ही देख सकते हैं कि दोनों तलवारों के नीचे गले हैं मेरे ही बुजुर्गों के।
हमें धर्म की यह ऐनक उतारनी पड़ेगी। इस ऐनक का नंबर गलत हो गया है और अपना देश हमें धुँधला-धुँधला दिखाई दे रहा है। हम हर चीज़ को शक की निगाह से देखने लगे हैं। हम आत्मा को नहीं देखते। वस्त्र में उलझकर रह जाते हैं। वे तमाम शब्द जो हमारी जबानों पर चढ़े हुए हैं, हमारे हैं। फ़ारसी के उन शब्दों को कैसे देश निकाल दे दिया जाय, जिनका प्रयोग मीरा, नानक और तुलसी नें किया है ? ये शब्द हमारे साहित्य में छपे हुए हैं, हमारी संस्कृति के मज़बूत आधार हैं एक ईंट सरकाई गई, तो पूरी इमारत गिर पड़ेगी।
सईद अम्मार जैदी
यह लेख स्वतंत्र पत्रकार का है ये उनके अपने विचार हैं इससे वेबसाइट का सहमत व जिम्मेदार होना जरूरी नहीं है।

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