Edited By Dil Prakash | नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated:

फाइल फोटो
हाइलाइट्स

  • टाइम्स ऑफ इंडिया में नॉर्दर्न कमांड के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी एस हुड्डा का ब्लॉग
  • भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख सीमा पर लंबे समय से चल रहा है विवाद
  • चीन ने तिब्बत में इन्फ्रास्ट्रक्चर का व्यापक विकास किया है, भारत देर से जागा
  • चीन का सैन्य क्षमता विकास फोक्सड, लेकिन भारत अब तक नहीं बना पाया है राष्ट्रीय रक्षा रणनीति

नई दिल्ली

भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख सीमा पर चल रहा विवाद को एक महीने से अधिक समय हो गया है लेकिन इसे सुलझाने के लिए हाल-फिलहाल कोई ठोस प्रगति की संभावना नहीं दिख रही है।

नॉर्दर्न कमांड के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी एस हुड्डा ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने ब्लॉग में लिखा कि बातचीत के जरिये इस संकट का शांतिपूर्ण समाधान निकलने की उम्मीद की जा सकती है लेकिन दोनों पक्षों की युद्ध रणनीति और क्षमताओं के बारे में भी चर्चा जरूरी है।

चीनी सेना की क्षमताओं पर चर्चा

इस बारे में कई तरह की चर्चा भी हुई है। जैसे लद्दाख में दो मोर्चों पर लड़ना पड़ सकता है जिससे उत्तरी लद्दाख और सियाचिन ग्लेशियर भारत के हाथ से निकल सकते हैं। साथ ही चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की क्षमताओं पर भी सवालिया निशान हैं क्योंकि उसे लड़ाई का अनुभव नहीं है।

चीन के खिलाफ भारत की रणनीति इस बात पर आधारित है कि चीन की सेना उत्तरी सीमा पर मुश्किल हालात में मुकाबला करने में कितनी सक्षम है। 1962 की लड़ाई के बाद भारत का रवैया चीन के प्रति रक्षात्मक रहा और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (एलएसी) पर भारतीय सैनिकों की ज्यादा मजबूत तैनाती नहीं थी। 1986 में वांगडुंग घटना के बाद भारत ने चीन सीमा पर अपने सैनिकों की तैनाती मजबूत की।

चीनी सीमा पर इन्फ्रास्ट्रक्चर का व्यापक विकास

इस घटना का नतीजा यह रहा कि 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच कई सीमा समझौते हुए। इस दौरान भारतीय सैनिक सीमा पर तैनात रहे लेकिन वहां बुनियादी ढांचे का विकास नहीं हुआ।

दूसरी और चीन ने तिब्बत में इन्फ्रास्ट्रक्चर का व्यापक विकास किया और 2006 में किंगहाई-तिब्बत रेल लाइन भी शुरू कर दी। भारत में 2000 के दशक के मध्य में इस पर गंभीरता से काम करना शुरू किया। 2010 में अरुणाचल प्रदेश में सेना की तैनाती बढ़ाने के लिए दो नई डिवीजन बनाई गई और फिर माउंटेन स्ट्राइक कोर बनी।

भारत बेहतर स्थिति में

वायुसेना और नौसेना में भारत बेहतर स्थिति में है। अगर आज दोनों देशों के बीच परंपरागत युद्ध होता है तो आकाश और समुद्र में भारत का पलड़ा भारी हो सकता है। लेकिन जब हम भविष्य की ओर देखते हैं तो हमें दो वास्तविकताएं नजर आती हैं। पहली यह कि परंपरागत बलों के संतुलन का झुकाव तेजी से चीन के पक्ष में जा रहा है। दूसरी यह कि चीन का सैन्य क्षमता विकास फोक्सड है जबकि भारत अब तक राष्ट्रीय रक्षा रणनीति भी नहीं बना पाया है। संकट में सैन्य क्षमता के दम पर ही रणनीति बन सकती है।

सैन्य बलों का आकार और संरचना देश के सामने मौजूद खतरों के वास्तविक मूल्यांकन पर आधारित होती है। दुर्भाग्य से हमारी सरकार ने इस बारे में गंभीर आकलन नहीं किया है कि भविष्य के युद्ध कैसे लड़े जाएंगे और उन्हें जीतने के लिए किस तरह की सैन्य संरचना की जरूरत होगी।



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here