भारत में ज्यादातर लोग अपनी संपत्ति की वसीयत नहीं करते हैं. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उनके बेटे-बेटियों, परिवार के लोगों या रिश्तेदारों को यह साबित करना पड़ता है कि दिवंगत शख्स के उत्तराधिकारी वहीं हैं. इसके लिए परिवार के सदस्यों को सक्सेशन सर्टिफिकेट यानी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र लेने की जरूरत पड़ती है.

कोर्ट में याचिका देनी पड़ती है

सक्सेशन सर्टिफिकेट वारिस के हक की पुष्टि करता है. उत्तराधिकार कानूनों के मुताबिक उसे दिवंगत की चल-अचल संपत्ति को पाने का हक होता है. इनमें बैंक बैलेंस, फिक्स्ड डिपोजिट, शेयर, म्यूचुअल फंड, निवेश इत्यादि सभी तरह की संपत्ति शामिल हैं.

संपत्तियों पर दावा करने वाले उत्तराधिकारी को एक तय फॉरमेट में सिविल कोर्ट में याचिका देनी पड़ती है. यह उसी कोर्ट में दायर करनी पड़ती है जिसके न्यायिक क्षेत्र में दिवंगत शख्स की प्रॉपर्टी होती है.

याचिका में सभी उत्तराधिकारियों के नाम, संपत्ति के मालिक की मृत्यु का दिन, समय और जगह का जिक्र करना पड़ता है. कोर्ट में इसके लिए डेथ सर्टिफिकेट जमा करना पड़ता है.

आपत्ति के लिए मिलते हैं 45 दिन

याचिका मंजूर होने के बाद कोर्ट अखबारों में एक नोटिस जारी करता है. इसके जरिये सक्सेशन सर्टिफिकेट जारी करने से पहले इस पर आपत्ति जताने के लिए 45 दिनों का समय दिया जाता है. आपत्ति दर्ज करने के लिए दस्तावेजों के साथ सबूत पेश करने पड़ते हैं. समय सीमा खत्म होने के बाद यदि कोर्ट को कोई आपत्ति नहीं मिलती है तो कोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में सक्सेशन सर्टिफिकेट जारी कर देता है. कोर्ट सर्टिफिकेट जारी करने के लिए फीस लेता है. यह प्रॉपर्टी के मूल्य पर निर्भर करती है. यह फीस फिक्स्ड पर्सेंटेज के तौर पर ली जाती है. इसे स्टैंप पेपर पर लिया जाता है.

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