Kejriwal asked PM Modi's Digree from CIC but Gujrat High Court stopped CIC order & imposed 25 thousand penalty on Cm Kejriwal
Kejriwal asked PM Modi's Digree from CIC but Gujrat High Court stopped CIC order & imposed 25 thousand penalty on Cm Kejriwal

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मोदी सरकार ने ये क्या किया, केजरीवाल हुए परेशान

इसी माह की 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली सरकार को अधिकारियों के तबादले और नियुक्ति करने का अधिकार संवैधानिक अधिकार है। एलजी को दिल्ली सरकार के फैसलों पर जिरह करने का हक नहीं। दिल्ली सरकार के कामों में अड़ंगा नहीं डालेेगे। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार के पास पुलिस, जमीन और पब्लिक सर्विस को छोड़ सभी विभागों की कमान होगी। ये बात न तो मोदी सरकार को हजम हुई और न बीजेपी को। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने या उसे न मानने की हिमाकत नहीं कर पा रहे थे।

Bihar CM Nitish Kumar slams Modi govt. on Fresh ordinance and assured ro support Delhi Govt.
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लेकिन ये बात तो तय थी कि अंदर ही अंदर मोदी सरकार और भाजपा इससे निपटने को खिचड़ी पका रही रहे थे। मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिये सुप्रीम कोर्ट से मिली पावर को दिल्ली सरकार से छीनने की साजिश रची है। इस नये बिल को लेकर कई विपक्षी नेताओं ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया है। बिहार के सीएम नितीश कुमार और डिप्टी सीएम ​तेजस्वी यादव और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी मोदी सरकार की कड़ी निंदा करते हुए दिल्ली सरकार का साथ देने का बयान दिया है।
मोदी सरकार ने 19 को अध्यादेश पास किया
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को काटने के लिये मोदी सरकार ने ऐसा फारमूला निकाला जिससे केजरीवाल सरकार मुंह के बल गिर गयी। मोदी सरकार ने 19 मई की रात 11 बजे एक अध्यादेश पास कर दिल्ली सरकार को बताया कि अफसरों के तबादले और नियुकितयां एलजी ही करेंगे। छह माह के अंदर इसके लिये नेशनल सिविल सर्विसेस कमेटी का गठन किया जायेगा। जिसके चेयरमैन सीएम होंगे। उनके अलावा चीफ सेक्रेटरी और गृहसचिव भी इस कमेटी होंगे। नियुक्तियों और तबादलों का फैसला बहुमत से किया जायेगा। सीएम केजरीवाल और आप नेता आर्डिनेंस को गैरसंचैधानिक करार दे रहे हैं उनका कहना है कि यह बिल अध्यादेश दिल्ली सरकार पर नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट और संविधान पर हमला है। सुप्रीम कोर्ट में यह आर्डिनेंस पांच मिनट भी नहीं टिक पायेगा। इसके जरिये मोदी सरकार केजरीवाल सरकार के ​कामों को रोकने की एक साजिश मात्र है।
सीएम की भूमिका जीरो रहेगी
अध्यादेश में जिस कमेटी का गठन करने की बात कही गयी उसके अनुसार जो भी निर्णय होगा उस पर केन्द्र सरकार की चलेगी। होम सेके्रटरी और चीफ सेके्टरी दिल्ली सरकार को रिपोर्ट न करके एलजी को रिपोर्ट करेंगे। ऐसे में सीएम की भूमिका और राय का कोई महत्व नहीं रहेगा। दोनो सेक्रेटरी की राय हमेशा सीएम से भिन्न ही रहेगी। अगर किसी सूरत में सीएम की राय से दोनों सेके्रटरी की राय एक हो भी गयी तो फैसला करने की सुप्रीम पावर एलजी के पास रहेगी।
डेढ़ माह के लिये सुप्रीम कोर्ट छुट्टी पर
मोदी सरकार इतनी चालाकी से इस अध्यादेश को पास कराया कि दिल्ली सरकार को इसकी काट करने का कोई मौका नहीं मिला। 19 मई शुक्रवार की रात 11 बजे लोकसभा में इस बिल को पास कराया गया। अब सुप्रीमकोर्ट छह सप्ताह के लिये अवकाश पर है। इस मामले में दिल्ली सरकार पहली जुलाई के बाद ही सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है।
कानून के जानकार इसे गैर संवैधानिक नहीं मानते हैं
मोदी सरकार के आर्डिनेंस पर कुछ विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह गैर संवैधानिक नहीं है। इससे पहले भी केन्द्र सरकारों ने सुप्रीमकोर्ट के आदेशों को बिल लाकर खारिज कर दिया है। अगर यह बिल संसद के दोनों सदनों में पास हो गया तो दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी के लिये बुरी खबर यह रहेगी कि उनके सभी अधिकार एक बार फिर एलजी के पास चले जायेंगे। दिल्लीवासियों को एक बार फिर सरकार और एलजी की तकरार का नतीजा झेलना पड़ेगा। जानकार यह भी कहते हैं कि यह बिल बहुत ही गंभीरता से ड्राफ्ट किया गया है। बहुत ही सूझबूझ और चतुराई से आडिनेंस बनाया गया है। मोदी सरकार समझ गयी थी कि सुप्रीम कोर्ट से उनके पक्ष में फैसला नहीं आयेगा। इसीलिये पहले से ही आर्डिनेंस की तैयारी कर ली गयी थी। अध्यादेश उस दिन लाया गया जिस दिन से सुप्रीम कोर्ट में छह सप्ताह की छुट्टी घोषित हो गयी थी। यानि दिल्ली सरकार को छह सप्ताह तक एलजी की गुलामी करनी पड़ेगी।

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