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CM Nitish Kumar is feeling uneasyness to handle goverment

पिछले दो तीन माह से बिहार में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल बनी रही। लेेकिन अब चुनाव के परिणाम आ गये हैं। सभी दलों के दावे और वादों का खुलासा हो गया है। सातवीं बार नितीश कुमार बिहार के मुख्यंत्री बन गये हैं। लेकिन इस बार उनके चेहरे पर वो रौनक और ठसक नहीं दिखी जो पहले दिखा करती थी। उसका बड़ा कारण यह है कि इस बार उनकी पार्टी को प्रदेश की जनता ने सिरे से नकार दिया  वहीं बीेजेपी को सिर माथे लेते हुए 74 उम्मीदवारों को जीत का सेहरा पहनाया है। जेडीयू के मात्र 43 सीटों पही सफलता मिल सकी।

2015 में जेडीयू को 71 सीटों पर जीत मिली थी तब वो महागठबंधन के घटक थे। लेकिन उस बार भी राजद सुप्रीमो लालू ने 80 सीटें जीतने के बाद भी नितीश कुमार को सीएम पद पर बैठने दिया था। इस बार भी हालात वहीं हैं लेकिन गठबंधन बदल गया है इस बार वो बीजेपी,वीआईपी और हम के साथ एनडीए के साथ हैं। लेकिन 2015 में जब वो सीएम बने तो उन्हें कांग्रेस व राजद का जबरदस्त समर्थन प्राप्त था। विपक्षी बीजेपी की हालत बहुत नाजुक थी। उस बार भी बीजेपी ने वो सभी मुद्दे उठाये जो इस बार पीएम मोदी, जेपी नड्डा, नित्यानंद राय और सुशील मोदी ने उठाये थे। लेकिन इस बार राजद नेता तेजस्वी यादव ने इस तरह की चुनावी रणनीति तैयार कर एनडीए को घेरा कि वो जनता के सामने जवाब देने में मजबूर हो गयी। एनडीए की रैलियोां में जंगलराज,वंशवाद, भ्र्ष्टाचार गुंडाराज, कश्मीरी आतंकवाद, राम मंदिर और हिन्दू मुस्लिम आदि को प्रमुखता से उठाया। लेकिन जनता ने तेजस्वी के रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सरकारी लापरवाही और कानून व्यवस्था को इतनी मुस्तैदी से समझा कि राजद बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है।

सातवीं बार बिहार की कमान संभालने वाले नितीश बाबू को बीजेपी ने सीएम तो बनया है लेकिन उनके हाथ पैर बांध दिये है। नितीश कुमार के विश्वसनीय सुशील मोदी को प्रदेश की राजनीति से पैदल कर दिया है। उनसे डिप्टी सीएम का पद छीनकर विधायक तारकिशोर प्रसाद और रेणू कुमारी को दिया गया है। बीजेपी को नितीश और सुशील मोदी की जुगलबंदी रास नहीं आ रही थी। लोगों का यह मानना था कि छोटे मोदी जेडीयू के प्रति उतने आक्रामक पिछले तीन सालों में नहीं दिख रहे थे जितना दिखना चाहिये था। आज के हालात में नितीश कुमार उतनी स्वतंत्रता से फैसले नहीं कर पायेंगे  जिनती आजादी से वो अब तक करते आये थे। चूंकि बीजेपी के विधायक संख्या बल में काफी अधिक हैं इसलिये उनकी मनमानी के आगे सुशासन बाबू को घुटने टेकने होंगे। अगर हम लगभग पांच साल पहले की बात करें तो नितीश कुमार और मोदी के बीच छत्तीस का आंकड़ा रहता था। यहां तक कि लोग नितीश कुमार को मोदी का विकल्प भी मानने लगे थे। लेकिन राजनीति में कोई सदा के लिये दुश्मन नहीं रहता है। 2015 में नितीश कुमार के डीएनए में मोदी ने खोट बताया था आज वहीं मोदी नितीश कुमार की शान में कसीदे पढ़ते नहीं थक रहे हैं। नितीश कुमार के कई बार पाला बदलने के कारण जनता में भी यह मैसेज गया कि नितीश कुमार को केवल सत्ता चाहिये। इस बात को महागठबंधन के नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान प्रमुखता से उठाया।

यह भी चर्चा में है कि ​बीजेपी ने इस चुनाव में जेडीयू और नितीश कुमार को ठिकाने लगाने के लिये गुपचुप तरीके से लोजपा को नितीश कुमार के पीछे लगाया जिसके चलते जेडीयू को भारी नुकसान उठाना पड़ा। कम सीटों के जीतने से जो नितीश कुमार बिग ब्रदर की भूमिका निभा रहे थे उन्हें छोटे भाई की भूमिका निभाने पर मजबूर कर दिया।

पूरे चुनाव के दौरान चिराग पासवान राजनतिक मंचों से सीधा नितीश कुमार को निशाने पर रख रहे थे। साफ तौर पर वो यह कहते कि वो बीजेपी के साफ हैं। उनके कार्यकर्ता यह नारा लगाते मोदी रहे कि मोदी से कोई बैर नहीं, नितीश तेरी खैर नहीं। चिराग पासवान ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि मैं तो मोदी का हनुमान हूं। वो मेरे बारे में कोई गलत बात कह ही नहीं सकते है। यह बात सच भी साबित हुई मोदी ने किसी भी मीटिंग व रैली में चिराग पासवान के बारे को अभद्र टिप्पणी नहीं की। वहं भाजपा के कई नेताओं ने चुनाव के दौरान ऐसे बयान दिये जिसका खंडन स्वयं नितीश कुमार ने प्रचार के दौरान किया। ऐसे बयान देने वालों में यूपी के सीेएम योगी, भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी और कई नेताओं के नाम शुमार थे। इन सब बयानों से भी नितीश कुमार की धर्मनिरपेक्षता पर संकट आया। चुनाव परिणाम आने के बाद नितीेश कुमार को शायद भाजपा और मोदी की ​कूटनीति का आभास हो गया हो। इसके लिये वो लोकसभा चुनाव तक इंतजार करने के सिवा कुछ करने में असमर्थ है।

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