नई दिल्ली: किसान आंदोलन में नून लोटा कसम की एंट्री हो गई है. मोदी सरकार के ख़िलाफ़ किसान पीछे न हट जाएं. इसीलिए इस कसम  का वास्ता दिया जा रहा है. आंदोलन के बहाने आरएलडी अपना राजनैतिक लाइन लेंथ ठीक करने में जुटी है. बड़े और छोटे चौधरी किसान आंदोलन में कूद कर अपना खेल बना रहे हैं. बहाना राकेश टिकैत के आंसुओं का है. लेकिन निशाने पर है यूपी का चुनाव. इसीलिए तो जयंत ताबड़तोड़ किसान महापंचायत कर रहे हैं. बीजेपी के सामाजिक बॉयकॉट की अपील कर रहे हैं. आरएलडी पिछले लोकसभा चुनाव का हिसाब बराबर करना चाहती है. अजीत सिंह और जयंत चौधरी दोनों.

पश्चिमी यूपी में नून लोटा कसम को जाट अपना मान और सम्मान समझते हैं. जिसने भी कसम तोड़ी उसे नमकहराम समझा जाता है. जाट बिरादरी में नून लोटा कसम किसी भीष्म प्रतिज्ञा से कम नहीं होती. लोटा में पानी, फिर पानी में नमक डाल कर ये कसम ली जाती है. खापों की परंपरा में नून लोटा क़सम तोड़ने वालों को बिरादरी से बाहर कर दिया जाता है.

नून लोटा कसम फिर से चर्चा में है. आरएलडी उपाध्यक्ष जयंत चौधरी की कसम पर पश्चिमी यूपी में बहस छिड़ी है. बात मुज़फ़्फ़रनगर के किसान महापंचायत की है. पंचायत बुलाई तो नरेश टिकैत ने थी. जो भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष हैं. अपने भाई राकेश टिकैत के आंसुओं ने उन्हें बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ बाग़ी बना दिया था. वे भारी ग़ुस्से में हैं. उनकी इसी नाराज़गी को थोड़ा और बढ़ाने के लिये जयंत चौधरी पूरी तैयारी के साथ आए थे. वे मंच से भाषण दे रहे थे. जयंत का एक साथी लोटा, बोतल में गंगाजल और नमक का पैकेट लेकर पीछे खड़ा था. मंच के सामने लोगों की भीड़ थी. बस जयंत ने मौक़े इमोशनल कार्ड खेल दिया. उन्होंने नून लोटा कसम खाई और नरेश टिकैत से भी ऐसा ही करने को कहा. उन्हें लगा जब मंच पर साथ हैं तो कसम भी साथ लेने में में क्या दिक़्क़त ! लेकिन टिकैत टस से मस नहीं हुए. जयंत का दांव चल नहीं पाया.

ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर राकेश टिकैत मीडिया से बात करते करते रो पड़े. फिर तो किसान आंदोलन को नई ताक़त मिल गई. अगले ही दिन उनके भाई नरेश टिकैत ने मुज़फ़्फ़रनगर में किसान पंचायत बुला ली. आरएलडी तो जैसे इसी मौक़े के इंतज़ार में थी. जयंत चौधरी पहले ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर राकेश से मिले और फिर मुज़फ़्फ़रनगर जाकर नरेश के साथ हो गए. मंच पर नरेश टिकैत और जयंत चौधरी ने साथ लड़ाई लड़ने का एलान किया. लड़ाई बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़. लेकिन ये साथ का भ्रम पहले कसम में टूटा. फिर बिजनौर की किसान पंचायत में. जब भारतीय किसान यूनियन के नेताओं ने जयंत को मंच पर चढ़ने से मना कर दिया. आरएलडी समर्थकों के हंगामे के बाद जयंत को मंच पर जगह मिली.

राकेश टिकैत के आंसू के बहाने जयंत चौधरी अपना राजनैतिक घर बसाने में लगे हैं. जो पिछले लोकसभा चुनाव में उजड़ गया था. चौधरी अजित सिंह मुज़फ़्फ़रनगर से चुनाव हार गए थे. जाटलैंड में उन्हें एसपी और बीएसपी का समर्थन था. तब भी चौधरी अपनी पगड़ी नहीं बचा पाए. कहते हैं कि राकेश टिकैत ने तब बीजेपी का साथ दिया था. किसान आंदोलन से चौधरी की उम्मीदें जग गई हैं. उनके बेटे जयंत हर दिन कहीं न कहीं पंचायत कर रहे हैं. बीजेपी के सामाजिक बॉयकॉट की कसमें खा रहे हैं. नून लोटा कसम से जाटों का दिल का रिश्ता रहा है. कहते हैं कि आज़ादी की लड़ाई में भी इसने बड़ा काम किया था. बात 1857 की है. मेरठ में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ सैनिकों ने बग़ावत कर दी थी. शाहमल की अगुवाई में हज़ारों जाट लोटे में नमक लेकर कसम ली थी अंग्रेजों को भगाने की. जाटों ने बड़ौत में सरकारी ख़ज़ाना लूट लिया था. बाद में अंग्रेजों से लड़ाई में वे शहीद हो गए.

गाजीपुर बॉर्डर पहुंचे संजय राउत, कहा- राकेश टिकैत की आंखों में आंसू देख नहीं रह सका 



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