Rahul with soniya Priyanka
Smt. Sonia gandhi is trying unite congress party leaders and workers

वर्तमान में कांग्रेस के लिये सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की अखंडता बनाये रखने की है। आज के हालात ऐसे हैं कि कांग्रेस के दिग्गज नेता या तो पार्टी छोड़ चुके हैं या फिर इस फिराक में हैं कि सत्तारूढ़ दल से सौदा कर सकें। ऐसे में पार्टी के ऐसे नेता की जो पार्टी को एकसूत्र में बांध सके। वर्तमान में पार्टी नेतृत्व के संकट से गुजर रही है। अफसोस की बात है कि पार्टी पिछले एक डेढ़ साल से स्थायी अध्यक्ष के पद से वंचित है। हार कर सोनिया गांधी को एक बार फिर पार्टी का नेतृत्व करना पड़ रहा है। सोनिया गांधी अपने स्वास्थ की वजह से पार्टी को पूरा समय नहीं दे पा रही हैं।

लोकसभा चुनाव परिणाम अनुकूल न आने के बाद राहुल गांधी ने नैतिकतर के ​आधार पर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। पार्टी कार्यकर्ताओं व दिग्गज नेताओं के समझाने के बाद भी राहुल ने अध्यक्ष पद न संभाला। उनका मानना है कि लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पार्टी की अध्यक्षता की थी अत: हार की जिम्मेदारी उन्हें ही लेभी नी पड़ेगी।

सोमवार को कांग्रेस पार्टी ने एक अहम् करने का फैसला लिया है। इस बैठक में कई अहम् मुद्दों पर फैसले आने की उम्मीद है। यह भी सुना जा रहा है कि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। हाल ही कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सभी दिग्गज नेताओं को क्षेत्र में सक्रिय होने के लिये पत्र लिखा था। उनका यह मानना है कि कांग्रेस को जिंदा करने के लिये वरिष्ठ नेता घर से बाहर निकलें और देशवासियों से संपर्क बनायें। सत्तारूढ़ से टक्कर लेने के लिये संगठन को मजबूत करने की जरूरत है।

कांग्रेस के 23 पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व केन्द्रीय मंत्रियों और दिग्गज नेताओं ने पत्र लिखकर पार्टी की वर्तमान हालत पर चिंता जतायी है। सोनिया गांधी ने उनके पत्र को गंभीरता लेते हुए इसके समाधान के लिये कुछ कड़े कदम उठाने की ठान ली है। देा के राजनीतिक हालात यह हैं कि पूरे देश में राज करने वाली कांग्रेस आज हाशिये पर आ गयी है। भाजपा ने कांग्रेस को ऐसी करारी मात दी है कि वो संभल नहीं पा रही है। लगातार दूसरी बार मोदी पीएम बन गये है। पांच साल के लिये एक बार फिर बीजेपी देश में राज करने का मौका पा चुकी है। आज हालात यह हैं कि भाजपा ने एक एक कर कांग्रेस के उन राज्यों पर फतेह पा ली जिन पर पर कभी कांग्रेस का राज होता था। हरियाणा, उत्तराख्ंड, मणिपुर, मेघालय, गोआ समेत कई राज्यों में येन केन प्रकारेण भाजपा ने अपनी सत्ता कायम कर ली है।

कांग्रेस के सामने कुछ अहम् चुनौतिया हैं जिसमें पहली बात अपने संगठन को मजबूत करना साथ ही कार्यकर्ताओं को पार्टी के प्रति वफादार बनाये रखना है। इसके साथ ही उन नेताओं को भी पहचानना है जो पार्टी में रह कर भी पार्टी के वफादार नहीं हैं। इस साल कांग्रेस पार्टी को दो बड़े नेताओं ने छला है। होली के करीब पूर्व केन्द्रीय मंत्री व दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा का दामन थाम लिया और अपने समर्थक विधायकों व मत्रियों को कांग्रेस सरकार को गिराने का काम किया। कमलनाथ सरकार सोती रही और उसके दो दर्जन विधायक भाजपा की गोद में बैठ गये। वैसे सिंधिया परिवार ने ऐसा पहली बार नहीं किया ये उनकी पुश्तैनी आदत है। ​सिंध्यिा और बागी विधायकों की मदद से भाजपा ने एक फिर मध्यप्रदेश में कमल खिला दिया।

कुछ माह ही बीते थे कि सचिन पाइलेट ने भी सिंधिया के नक्शे कदम पर चलते हुए। राजस्थान में अपनी पार्टी की सरकार के खिलाफ बगावत करते हुए भाजपा से हाथ मिलाने की साजिश रची। लेकिन हालात उनके पक्ष में नहीं हुए तो वापस कांग्रेस में आ गये। लगभग एक माह तक राजस्थान सरकार के दो दर्जन मंत्री व विधायक जयपुर छोड़ हरियाणा के होटल रिसार्ट में ठहरे। इससे भी कांग्रेस की काफी छवि खराब हुई। यह देखा गया है कि जब भी देश में चुनाव होता है तो बीजेपी कांग्रेस के विधायकों और सांसदों को ही तोड़ती है। इसके लिये वो धन और सीबीआई, ईडी और पुलिस के इस्तेमाल से भी नहीं चूक रही है। प्रदेशवासियों को कोरोना काल में सियासी संकट के कारण खामियाजा भुगतना पड़ा। वर्तमान हालात में पार्टी के हितों को ध्यान में रख कुछ कड़े कदम उठाने होंगे।

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