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अरे! अम्मा आप के हाथ में तो काफी जोर की चोट लगी है।
हां एक मोटरसाइकिल वाले ने घर आते समय टक्कर मार दी। टक्कर मारने के बाद
उसने पलट कर देखा भी कि मुझे कितनी चोट आयी है। वृद्ध महिला ने दर्द से
कराहते हुए जवाब दिया।बात भी सही है कि टक्कर मारने के बाद भला कोई
शहसवार रुकता है। रुकेगा तो लोग उसे मार मार कर अधमरा कर देंगे। राह चलता
हर आदमी बहती गंगा में हाथ धो लेता है। रास्ते में कुछ राहगीरों ने
बुजुर्ग महिला को सहारा दे कर उठाया।
लगभग 60 से 65 के बीच की रही होंगी वो महिला। किसी तरह वो अपने घर की ओर
आॅटो कर के आयींं। घर पर आने पर भी उनका हाल जानने की किसी ने कोई प्रयास
नहीं किया। घर पर वैसे भी उनकी बहू बेटे से बनती नहीं है। आदमी भी कहने
के लिये है उसे अपनी औरत की तकलीफों से कोई वास्ता नहीं उनको तो खाना
वक्त पर चाहिये। उनके शौक का सारा खर्चा भी उनकी पत्नी उठाती है। मालूम
हुआ कि महिला काफी सालों से अपने परिवार का खर्चा उठाने के लिये किसी
कारखाने में मजदूरी करती हैं। किसी तरह अपने और अपने आदमी के गुजर बसर
करने के लिये वो आठ दस हजार रुपये कमा लेती हैं। उस पर भी उसके बहू बेटे
की नजर रहती है।
ऐसा नहीं कि बेटा कुछ करता नहीं हो। वो भी प्राइवेट नौकरी कर बीस तीस
हजार कमा लेता है। ऐसा उसकी बीवी का कहना है। लड़का सिर्फ अपनी जरूरत
पूरी करने के वक्त ही अपनी मां से बात करता है। वृद्धा मां से लड़का का
कोई मोह या नहीं लेकिन ये अपने पोते पोती पर जान छिड़कती हैं। उनके आदमी
भी दिन भर में 40 पचास रुपये की चिप्स और कुरकुरे खरीद कर चटा देते हैं।
इसका भुगतान भी दादी के खाते से किया जाता है।
पत्नी ने

कहा कि सुनो! जी वो नीचे वाली अम्मा के हाथ में चोट लग गयी है।
काफी दर्द हो रहा है। उनको उनके घर से कोई भी इलाज के बारे में नहीं सोच
रहा है। क्या मैं उन्हें पास के अस्पताल से दवा दिलवा लाऊं।
मैंने सवालिया नजरों से पत्नी को घूरा कि क्या उनके घर में कोई नही है कि
जो तुम उन्हें दवा दिलवाने की जरूरत है।
पत्नी ने दुखी मन से बताया कि जिस लड़के से वो उम्मीद है कि बुढ़ापे में
रोटी देगा। उसने एक बार भी फूटे मुंह से नहीं कि अम्मा कैसे चोट लग गयी।
आ कर देखा भी नहीं मां के कहां कहां चोट लगी है। उसकी बहू ने तो वैसे भी
पराये घर की लड़की है। जब अपने जाये बेटे ने ही हाल नहीं पूछा तो बहू से
क्या उम्मीद रखे वो। मुझे यह सब सुन कर बड़ा गुस्सा आ रहा था कि ऐसे
लड़के से तो बे औलाद रहना ज्यादा अच्छा है। अपनी मां को इज्जत न दे कर
अपनी सास को मम्मी जी मम्मी करने वाले लड़के को जब पैसे मांगने होते तो
वो अपनी बेटी से कह कर रुपये ऐंठ लेता है। इतना ही नहीं वो अपने बाप के
साथ मिल कर मां के साथ बुरा बर्ताव करने से नहीं चूकता है। बाप दिन भर
पास की दुकान पास बैठ कर बीड़ी फूंकता रहता है।
सिंगल बीएचके फ्लैट में एक कमरे में बेटे और बहू ने कब्जा कर रखा है। मां
बाप के लिये बाहर एक पलंग है। जिसपर वो और उनका पोता साथ सोता है। किसी
तरह वो अपना जीवन यापन कर रहे हैं। दिन भर बच्चे अपने बाबा के सिर पड़े
रहते हैं। कोई भी कुछ भी बेचने वाला आ जाये तो फुक्का फाड़कर उनका पोता
पोती सड़क पर ही फैल जाते हैं।
पोता जरा कम बुद्धि का है इसलिये दादी का दिल और भी ज्यादा पसीजता है। पोते पोती दादी और दादा का ही खून पीते हैं। बाबा दादी भी यह मान कर पैसा खर्च करने में नहीं चूकते हैं लेकिन उन्हें ये भी सोचना चाहिये कि दिन भर खून पसीना कर बूढ़ा कमाती हैं उससे उनका खुद का खर्च बमुश्किल ही चल पाता है। इसके अलावा लड़का बहू भी किसी न किसी बहाने उनसे पैसे झंटते रहते हैं मसलन आज गैस खत्म हो गयी है। तो कभी पोते के इलाज के लिये दो हजार दे दो। तो कभी बहू बीमार है तो कभी खुद लड़का बीमार है। हालात इतने ज्यादा खराब हैं कि बिना कुछ खाये घर से काम के लिये निकलना पड़ता है। बहू किसी न किसी बहाने किचन में कुछ करती रहती है जिससे बूढ़ा को अपने और आदमी के लिये कुछ नहीं बना पाती हैं। ऐसे में उनके आदमी को भी कुछ खाये बिना रहना पड़ता है। ये बात दीगर है कि आदमी उनसे सुबह ही सौ पचास रुपये झटक ही लेते हैं।
….शेष अगली कड़ी में








