Arawal Marriage introduction Programme
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पार्ट 1 बात उन दिनों की

बात उन दिनों की है जब मैं यूपी की राजधानी लखनऊ में पत्रकारिता कर रहा था। बात 2003 के आसपास की होगी। उन दिनों में जनसत्ता ऐक्सप्रेस में डेस्क पर था। मैं मूलत: कानपुर का रहने वाला हूं नौकरी की वजह से लखनऊ में रह रहा था। गोमतीनगर विपुल खंड में बहन का अपना मकान था वो दिल्ली में अपने परिवार केसाथ रहती थी। मैं अपने दो बच्चों के साथ उनके मकान के एक पोर्शन में रहता था। सैलरी बहुत अधिक नहीं थी यही वजह थी कि मैं बहन के मकान में रह रहा था। वो कभी कभी दिल्ली से लखनऊ आती तो अपने ही मकान में रहती थी।

नवंबर माह में वैवाहिक परिचय सम्मेलन का आयोजन

उन दिनों के जाड़े मौसम में लखनऊ के अग्रवाल सभा ने लगभग 20 साल पहले दो दिवसीय वैवाहिक परिचय सम्मेलन का आयोजन मोती नगर स्थित एक कालेज में करवाया था। कानपुर से मां ने कहलवाया कि छोटे भाई का पंजीकरण इस परिचय सम्मेलन में कराने को कहा। तब उस समय परिचय सम्मेलन में पंजीकरण कराने के लिये 200 रुपये का शुल्क लगता था। मैंने भी अपने छोटे भाई का पंजीकरण करवा दिया। वैसे मेरे दो छोटे भाई थे। सबसे छोटे भाई ने बीएससी मैथ से की थी। एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के साथ कोचिग में पढ़ाता भी था। उस समय के हिसाब से आमदनी ठीक ठाक हो जाती थी। उस अग्रवाल महासभा लखनऊ के महामंत्री विवेक जैन थे जो समाजसेवी के साथ एक जाने माने व्यापारी भी थे। जब मैं उनसे मिला तो बड़े ही अपनेपन से मिले। उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए कहा अपने ही घरों के बच्चे आयेंगे तभी तो हमारा आयोजन सफल होगा। शनिवार के दिन सुबह दस बजे कार्यक्रम का प्रारंभ अग्रसेन महाराज की पूजा अर्चना के साथ हुआ। इस कार्यक्रम अग्रवाल समाज की विभिन्न जातियों और गोत्रों को विस्तार से बताया गया। क्यों कि बहुत से लोगों को अपनी जाति और गोत्र की जानकारी नहीं होती है।

आयोजन स्थल पर भी पंजीकरण

परिचय सम्मेलन के आयोजन स्थल पर आयोजकों ने ऐसे शादी योग्य युवक युवतियों के पंजीकरण की व्यवस्था कर रखी थी। पहले यह तय हुआ था कि कार्यक्रम में केवल पंजीकृत लड़के लड़की को ही सम्मिलित किया जायेगा। लेकिन यह भी गया कि जो लोग पंजीकृत नहीं होंगे अगर वो आयोजन स्थल पर आ गये तो उनको भी शामिल करना होगा क्यों वो लोग आस पास के शहरों और जिलों से आयेंगे। ऐसे में उनको शामिल नहीं किया तो उन्हें काफी बुरा लगेगा। यह समझा जा सकता था आज से 20 साल पहले कम्प्यूटर पर पंजीकरण कर उनकी लिस्ट बनाना बहुत ही हैरत की बात थी। लेकिन लोगों का परिचय सम्मेलन के प्रति काफी रुझान था। जो स्थानीय लोग थे उन्होंने समय सीमा के भीतर अपना पंजीकरण करा लिया था। लेकिन बहुत से लोग ऐसे थे जो पंजीकरण नहीं करा पाये और आयोजन स्थल पर पहुंच गये। ऐसे में उनका भी पंजीकरण हो गया। इससे वो बहुत ज्यादा खुश दिखे। लेकिन एक बात का जिक्र करना जरूरी है कि उस समय भी लोग अपनी लड़कियों को सम्मेलन में लाने कतराते थे। केवल लड़की का फोटो ही साथ लाते थे।

वर वधू मंच पर आगमन

आयोजन कर्ताओं ने युवक और युवती के आपसी परिचय का बहुत ही शानदार अरैंजमेंट किया था। जिस मंच पर अग्रसेन महाराज की आरती संपन्न हुई थी वहां लगभग एक दर्जन कुर्सियां लगायाी गयी थी। पंजीकरण के हिसाब से वर और वधू के लिये नंबर दिया गया था। उसी नंबर के आधार पर लड़के और लड़की को मंच पर बुलाया जाता था। आयोजन कर्ताओं ने यह निर्देश दिया था कि वर और वधू के उम्मीदवारों को अपना पंजीकरण टैग अपने कपड़ों पर लगायें। जिससे पता चल सके बल्कि कौन उम्मीदवार है और कौन गार्जियन। एक बात यह थी कि टैग देख कर ही लोग एक दूसरे से बातचीत करने के लिये आ​कर्षित होते थे। मंच के सामने ही अन्य लोग कुर्सियों पर बैठ कर इस सम्मेलन का मजा लेते थे। एनाउंसर यह ऐलान करता कि फलाने पंजीकरण संख्या वाले उममीदवार से अमुक पंजीकरण संख्या के परिजन मिलना या बात करना चाहते हैं। इस सम्मेलन में पूरे यूपी के अलावा यूपी के आसपास के अन्य प्रदेशों से भी लोग आये थे। मुझे याद आ रहा है यह सम्मेलन दूसरा या तीसरा था जो यूपी की राजधानी में लखनऊ में पहली बार आयोजित किया गया था। जो लोग अपनी बच्चों के लिये परिचय सम्मेलन भाग ले रहे थे वो अपने बच्चों के बारी आने का इंतजार कर रहे थे। और जो लोग परिचय सम्मेलन में एनजॉय  करने आये थे। वो कालेज के परिसर में लगे चाय पकौड़ी और खाने पीने का आनंद उठा रहे थे। हम लोग भी इन्हीं में शामिल थे। मेरे छोटे भाई को परिचय सम्मेलन में कोई खास ​रुचि नहीं थी। वो भी हमारे साथ में ही मटरगश्ती कर रहा था। उस वक्त परिचय सम्मेलन में परिजनों की संख्या पर कोई प्रतिबंध नहीं था। इसलिये हम सब चार पांच लोग कार्यक्रम में भाग लेने पहुंच गये थेा सबके लिये अलग अलग चाय, नाश्ते और खाने के कूपन मिल गये थे। खाने पीने के बहुत ही अच्छे इंतजाम किये गये थे। व्यवस्था के चलते सभी को समय से खाना और नाश्ता मिल रहा था। ऐसे समय में भी बहुत से अग्रवाल व्यापारियों ने अपने अपने खाने पीने के स्टॉल लगा रखे थे। इस जरिये उनके प्रोडक्ट का भी प्रचार किया जा रहा थे। कुछ व्यापारियों ने खाने और नाश्ते की स्पांसरशिप ले रखी थी। सब कुछ अच्छी तरह से मैनेज किया जा रहा था।

शेष अगली कड़ी में

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