I have attendend so many marriage in my life but some are so memorable
I have attendend so many marriage in my life but some are so memorable

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हमारे जीवन में कुछ ऐसे अनुभव होते हैं जिन्हें हम चाह कर भी नहीं भूल पाते हैं। वो जब भी हमें याद आते हैं हमारे होठों पर बरबस मुस्कराहट आ ही जाती है। उन्हीं अनुभवों को मैं शब्दों में बांधने का प्रयास कर रहा हूं।
बात 1989 की होगी जब मैं डिप्लोमा कर रहा था। पिछली कहानियों में मैंने अपने मित्र देवेंद्र गुप्ता उर्फ दीपू का जिक्र किया था। यह वाकया भी उसी से जुड़ा हुआ है। हमारा डिप्लोमा तो पूरा हो गया था। साथ बहुत से लोगों को जॉब भी मिल गया था। मेरी बदकिस्मती थी कि मेरा जब डिप्लोमा के आधार पर नहीं लगा था। देवेंद्र का जॉब एचएएल में अप्रैंटिस के रूप में लगा था। उसके साथ लगभग एक दर्जन लोगों को डिप्लोमा के आधार पर सिलेक्शन हो गया था। बाद में वो सभी लोग एचएएल के पक्के मुलाजिम भी हो गये। लेकिन मेरा और दीपू का रिश्ता कायम रहा। मेरा दीपू से कम उनके घर से ज्यादा जुड़ाव हो गया था। मेरा भी एक प्राइवेट कंपनी में जॉब लग गया था। जॉब टाइम सुबह साढ़े नौ से शाम छह बजे तक था। इसलिये संडे को ही दीपू के घर जाने का मोका मिल पाता था। वहां राजू, सोनू, गुड़िया और पप्पी के साथ दिन भर समय कब कट जाता पता नहीं चलता था। कभी कभी तो वहां रात को रुक भी जाता था। सच बात तो यह थी कि वहां मुझे बिल्कुल भी परायापन नहीं महसूस होता था। सब अपने से लगते थे।

Indian marriages are so religious and so interesting stories also which feel
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साधन संपन्न परिवार व सरल स्वभाव
चूंकि दीपू का जॉब सुलतानपुर अमेठी में था वो घर से बाहर रहता था। उसके पिता जी सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर थे। गोविंद नगर में उन्होंने तीन मंजिला पक्का मकान था। दीपू के अलावा उनके दो बिटिया और तीन बेटे और थे। वो सब दीपू से छोटे थे। लिहाजा वो पढ़ रहे थे। आज सबके सब बड़े हो गये हैं। दोनों बहनों की शादियां हो गयी हैं। दोनों बहनों के बच्चे बड़े हो गये है और ससुराल में खुशी से रह रही हैं। भाइयों में एक भाई राजू अपनी फैमिली के साथ यूएस में सैटिल हो गया है। उसने एमसीए किया था और एक अच्छी कंपनी में जॉब कर रहा थां। वहीं से उसे यूएस जाने का मौका मिल गया और वो वहां अब खुशहाल जिंदगी जी रहा है। बचपन में वो बहुत ही सीधा साधा साधारण सा दिखता था। लेकिन अंकल ने उसे एमसीए करवा दिया जिससे उसकी जिंदगी सेट हो गयी। दूसरा भाई अपने नाना नानी के साथ रहता था। बाद में वो उन्हीं के साथ रहने लगा। सबसे छोटा भाई विनीत है जो सरकारी स्कूल में टीचर हो गया है। दोनों भाइयों का खुशहाल परिवार है। दोनों के ही एक लड़का और एक लड़की है।
चूंकि अंकल को ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो दीपू के न रहने पर उनके घर की कुछ कामों में मदद कर सके। साथ ही विश्वसनीय भी हो। उन्हें ये सब खूबियां मुझमें दिखी और उन्होंने अपने घर और दिल में जगह दे दी। मुझे भी उनके घर मे वो प्यार स्नेेह और अपनापन मिला जो अपने घर में नहीं मिलता था। मैं सप्ताह में एक दो बार गोबिन्द नगर जाता रहता था। मुझे इस बात को कहने में कोई दिक्कत नहीं कि मुझे आंटी और अंकल का पूरा प्यार और सम्मान मिला इसके बदले में मैं भी उन्हें पूरा सम्मान और सहयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था। ये कहा जाये कि मैं दीपू के घर का सदस्य के रूप में स्थापित हो गया था। इस बात को मेरी मम्मी भी जानती थी कि गोबिंद नगर में मेरी क्या वकत थी। इस वजह से वो मेरे गोविद नगर जाने पर ऐतराज नहीं करती थी।
दीपू की शादी का यादगार संस्मरण
दीपू का जांॅब एचएएल में लग गया था। ये भी कंफर्म था कि कुछ दिनों बाद ंउसे कंफर्म कर दिया जायेगा। आंटी और अंकल ने उसकी शादी का मन बना लिया और लड़की की तलाश मे जुट गये। दीपू की भी इसमें रजामंदी थी। जॉब भी लग गया था और उम्र भी शादी के लायक हो गयी थी। उस समय लडके या लड़कियां शदी जैसे मामले में बहुत ज्यादा मुंह नहीं खोलते थे। माता पिता ने जहां बात चलायी, बस वहीं अपनी रजामंदी दे दी। वैसे भी देवेंद्र काफी शर्मीला था। फिलहाल घर वालों की निगाह में तो शांत और कम बोलने वाला था। खैर घर वालों ने दीपू के लिये लखनऊ की सजातीय परिवार की पढ़ी लिखी और सुशील लड़की प्रीति से दीपू की शादी की बात पक्की कर दी। वैसे तो दीपू शादी के पहले इंटर ही था। बाद में उसने ग्रेज्यूएशन कर लिया था। प्रीति साइंस ग्रेज्यूएट थी। दीपू की शादी लखनऊ के अमीनाबाद इलाके से होना तय हुआ था।
उन दिनों मैं सहारा में काम करता था। मेरी पोस्टिंग उरई में थी। कानपुर महीने में दो या तीन बार आफिस के आना होता था। तब मैं गोबिंद नगर जरूर जाता था। अंकल आंटी अक्सर कहते कि दीपू की शादी की बहुत सारी तैयारियां करानी हैं उसके लिये तुम्हें छुट्टी लेनी होगी। मैं भी इस बात के लिये बिल्कुल तैयार रहता था। लेकिन बाहर तबादला होने से मैं उनकी बहुत ज्यादा मदद नहीं कर सका। बरात में जाने के लिये मैं उरई से सीधा दीपू के घर पहुंचा था। अंकल आंटी मुझे देख कर काफी खुश हुए। अंकल आंटी का रिश्ता सिर्फ मेरे से ही नहीं था। बल्कि वो मेरे शास्त्रीनगर वाले घर पर मम्मी से भी मिलने आया करते थे। हम लोग एक दम घरेलू हो चुके थे। दीपू की शादी में मम्मी और भाई भी शामिल होने आये थे। ऐसा लग रहा था कि बिल्कुल घर की शादी है।
आगे बारात में क्या क्या हुआ यह सब जानने के लिये आपको अगली कड़ी का इंतजार करना होगा। एक बात का वादा है कि आप को पढ़ कर हंसी जरूर आयेगी। बारातियों के साथ क्या क्या हुआ इंतजार करिये अगली कड़ी का।

 

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