Peoples are doing business on the name of religion
Peoples are doing business on the name of religion

#MyViews#Mybios#Memoories#Authorpage@LitratureNews#Storyteller#Blog#

दोस्तों आज मैं कुछ अलग हट कर लिखने की सोच रहा हूं। कल शाम को मैं मैं बाजार में यूं ही टहल रहा था अचानक मेरी नजर एक दुकान की ओर पड़ी जहां पर एक मेज पर हनुमान जी का बड़ा सा फोटो रखा था जिस पर फूल माला और अगर बत्ती सुलग रही थी। वहां से गुजरने वाले लोग श्रद्धावत शीश झुका रहे थे। कुछ लोग उस फोटो के आगे अपनी सहूलियत से दान भी कर रहे थे। वहां एक आदमी माथे पर चंदन का टीका लगाये कुछ नोट कर रहा था। उसे इस बात से कोई मतलब नही था कि कौन कितना रुपया चढ़ा रहा है या कौन सा भजन बज रहा है। भजन शायद उसने धर्मभीरू लोगों को आकर्षण के लिये चला रखा था। यानि लोगों को हनुमान जी की ओर खींचने के लिये। दिलचस्प बात यह कि वो खुद किसी और दुनिया में मग्न था।

राम के नाम पर हो रही राजनीति

मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि जो व्यक्ति लोगों को धर्म की राह दिखाने का काम कर रहा है वो खुद उसके प्रति इतना लापरवाह है। उसे देख कर न जाने कितने लोग हनुमान जी की ओर आकृष्ट हो रहे हैं एक वो है न जाने किस धुन में खोया हुआ है जो हनुमान को भी भुलाये हुए है। इससे साफ समझ में आता है कि ऐसे लोग सिर्फ अपने फायदे के लिये ही लोगों को धर्म के जाल में फंसा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। देश में भी कुछ राजनीतिक लाभ के लिये राम के नाम का सहारा ले रहे हैंं। वो लोग नगर निगम से ले कर आम चुनाव तक श्रीराम का नाम लेकर जनता वोट मांगते हैं। इतना नहीं उन्होंने तो जम्मू कश्मीर में आतंकी मारे गये लोगों के नाम पर अपने लिये वोट मांगे। इतना ही नहीं देश की राजनीति में अब धार्मिक स्थलों और मंदिरों को भी शामिल कर लिया गया है।

धर्म के नाम पर हिंसा क्यों

देश में अब कोई राजनीतिक गतिविधि होती है तो उसमें गाय और मंदिर को मुद्दा बनाया जाता है। हर कोई अपने धर्म या मजहब के हिसाब से पूजा अर्चना करने को स्वतंत्र है। यह अधिकार हमे संविधान ने दिया है। इसका सम्मान करना चाहिये। लेकिन संविधान के अन्य प्रावधानों का भी सम्मान होना चाहिये। सत्ताधारी दल संविधान को भी अपने हिसाब व सहूलियत से कर रहे हैं। समाज के हर व्यक्ति को संविधान ने अपने मन से पूजा करने और रहने खाने की आजादी दी है। लेकिन यह देखा जा रहा है कि कुछ सामाजिक संस्थाएं और राजनीतिक दल दूसरे मजहब के लोगों के रहने सहने पूजा करने और खान पान पर भी जबरिया रोक लगाने का प्रयास कर रहे हैं। इतना ही नहीं ऐसे लोग धर्म के नाम हिंसा भी करने से नहीं चूक रहे हैं। इस पर न तो सरकार कोई रोक लगाती है और न ही पुलिस प्रशासन कोई कार्रवाई करता है जिससे ऐसे लोग अपनी मनमानी करने को तैयार रहते हैं। कुछ स्वयं भू संस्थाएं व कार्यकर्ता झुण्ड के रूप में इकट्ठा हो कर हिंसात्मक हमले कर दूसरे मजहब के लोगों पर जुल्म ढाते हैं।

अब हम बात करते हैं ​कि पिछले सात आठ सालों से देश में धार्मि​क अनुष्ठान और प्रवचनों की  बाढ़ आ गयी है। इस बात का विरोध नहीं है कि ये अनुष्ठान क्यों हो रहे हैं। विरोध इस बात का है कि इनकी आड़ में जो धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है उससे समाज की सद्भावना और सौहार्द को खत्म किया जा रहा है। जैसे गौरक्षा के नाम पर कुछ अराजक तत्व संप्रदाया विशेष के लोगों को अपना शिकार बनाते हैं और उनकी हत्या तक कर डालते हैं लेकिन सरकार की निष्क्रियता और प्रशासन सरकार की चापलूसी की वजह से इन पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाता है।

धर्म के साथ कर्म भी बहुत जरूरी

अब बात करते है कि धर्म की। धर्म के साथ कर्म भी बहुत जरूरी है। धर्म धारण किया जाता है लेकिन कर्म के बिना मानव जीवन यापन संभव नहीं है। अगर हम दिन भर पूजा पाठ में लगे रहेंगे तो हमारा परिवार कैसे जीवित रहेगा। परिवार के प्रति हमारा कर्तव्य भी होता है उसको निभाने के लिये कर्म तो करना ही होगा। मान लीजिये कि एक डाक्टर किसी अस्पताल में मरीजों का उपचार करता है जिससे लोग स्वस्थ रहते हैं। अगर डाक्टर अस्पताल में गेरुआ वस्त्र पहन कर हनुमान चालीसा का पाठ करे ओर जांच और सलाह न दे तो क्या रोगी स्वस्थ होगा। आपरेशन करने के बजाये वो उसे पूजा के फूल थमायेगा तो क्या रोग ठीक होगा। अस्पताल के वार्डों में तेज आवाज हनुमान चालीसा या आरती का आयोजन किया जायेगा इससे मरीज ठीक होंगे या और ज्यादा परेशान हो जायेंगे। उसी तरीके यदि इंजीनियर अपने साइट पर वैज्ञानिक सोच के अनुसार काम नहीं करे और वहां केवल राम नाम जपे तो क्या बड़े बड़े पुल और इमारतें ठीक ठाक बन पायेंगी। इसी लिये कहते हैं कि धर्म की जगह धर्म की बात होना उचित हौता है। जीवन में धर्म के अलावा कर्म का भी उतना ही महत्व है जितना कि धर्म का। जीवन में दोनों के संतुलन से ही जीवन सार्थक हो सकता है। साथ ही इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि कोई धर्म दूसरे धर्म की आलोचना या बुराई करने की शिक्षा नहीं देता है। सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य होता है कि मानव धर्म की सेवा और परोपकार है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here