Mayawati Brahmin convention in Ayodhya: मायावती की पार्टी बीएसपी कल से उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन की शुरुआत करने जा रही है. भगवान राम की नगरी अयोध्या में होने वाले पहले सम्मेलन के ज़रिये बीएसपी जहां ब्राह्मणों वोटरों को रिझाने की कोशिश करेगी, वहीं विधानसभा चुनावों के लिए इसे मायावती के शंखनाद के तौर पर भी देखा जा रहा है. हालांकि बीएसपी के इस ब्राह्मण सम्मेलन पर विवाद खड़ा हो गया है, क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी में सियासी पार्टियों के जातीय सम्मेलनों व रैलियों पर पाबंदी लगा रखी है. ऐसे में मामला एक बार फिर से न सिर्फ अदालत की दहलीज तक जा सकता है, बल्कि इस पर कोर्ट या सरकार रोक भी लगा सकती है.

यूपी में चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज़ हो चुकी मायावती की बहुजन समाज पार्टी कल 23 जुलाई को अयोध्या में ब्राह्मणों के सम्मेलन का आयोजन कर सूबे में कुछ महीनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंकने जा रही है. हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट की रोक के बावजूद एक जाति विशेष का यह सम्मेलन कैसे होगा, इस पर विवाद भी है और सवाल भी. हाईकोर्ट के आदेश की फ़िक्र न तो बीएसपी को है और न ही उस योगी सरकार को, जिस पर आदेश का पालन कराने की ज़िम्मेदारी है. दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 जुलाई साल 2013 को मोती लाल यादव द्वारा दाखिल पीआईएल संख्या 5889 पर सुनवाई करते हुए यूपी में सियासी पार्टियों द्वारा जातीय आधार पर सम्मेलन-रैलियां व दूसरे कार्यक्रम आयोजित करने पर पाबंदी लगा दी थी. जस्टिस उमानाथ सिंह और जस्टिस महेंद्र दयाल की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि सियासी पार्टियों के जातीय सम्मेलनों से समाज में आपसी मतभेद बढ़ते हैं और यह निष्पक्ष चुनाव में बाधक बनते हैं.

11 जुलाई 2013 को लगाई गई पाबंदी आज भी बरकरार है

अदालत ने जातीय सम्मेलनों पर पाबंदी लगाते हुए चुनाव आयोग और सरकार के साथ ही चार प्रमुख पार्टियों कांग्रेस-बीजेपी, सपा और बसपा को नोटिस जारी कर उनसे जवाब तलब कर लिया था और सभी से हलफनामा देने को कहा था. इलाहाबाद हाईकोर्ट की वकील सहर नक़वी के मुताबिक़ इस मामले में आठ साल से ज़्यादा का वक़्त बीतने के बाद भी किसी भी पार्टी ने आज तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है, लिहाजा 2013 के बाद इस मामले में दोबारा कभी सुनवाई नहीं हो सकी है. सहर नकवी का कहना है कि आठ सालों से सुनवाई भले ही ठप्प पड़ी हो, लेकिन 11 जुलाई 2013 को लगाई गई पाबंदी आज भी बरकरार है.

क़ानून के जानकारों का कहना है कि हाईकोर्ट की पाबंदी के बावजूद बीएसपी का ब्राह्मण यानी एक जाति विशेष के लिए सम्मेलन आयोजित करना न सिर्फ अदालत की अवमानना है, बल्कि हाईकोर्ट के आदेश के तहत यह अपराध की कैटेगरी में भी आता है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील विजय चंद्र श्रीवास्तव के मुताबिक़ इस तरह के जातीय सम्मेलनों पर रोक लगाना सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है. सरकार को न तो ऐसे सम्मेलनों के लिए अनुमति देनी चाहिए और साथ ही अगर जाति के नाम पर कहीं भी सम्मेलन या कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो अदालत के आदेश का अनुपालन कराते हुए उसे सख्ती से रोकना भी चाहिए. विजय श्रीवास्तव का कहना है कि इस मामले में याचिकाकर्ता या कोई भी दूसरा व्यक्ति अदालत में अवमानना का केस दाखिल कर सकता है.

अदालत इस पर सुओ मोटो यानी स्वतः संज्ञान ले सकती है. पार्टी के साथ उसके प्रमुख पदाधिकारियों और सम्मेलन से जुड़े नेताओं के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है. हाईकोर्ट की वकील सहर नकवी और विजय श्रीवास्तव का कहना है कि अगर बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों के आयोजन के लिए सरकार या स्थानीय प्रशासनिक अमले की तरफ से अनुमति दी गई है तो यह हैरानी की बात है, क्योंकि अगर एक पार्टी के जातीय सम्मेलनों पर रोक नहीं लगेगी तो आने वाले दिनों में दूसरी पार्टियां भी खुलकर जातीय कार्ड खेलने की कोशिश करेंगी. वकील विजय चंद्र श्रीवास्तव का कहना है कि बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों पर रोक लगाए जाने की मांग को लेकर वह खुद हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करेंगे.

बीएसपी नेता अपनी सियासी दलीलों से खुद का बचाव कर रहे हैं

हाईकोर्ट के आदेश की बात सामने लाए जाने से बीएसपी बैकफुट पर ज़रूर है, लेकिन उसके नेता अपनी सियासी दलीलों से खुद का बचाव कर रहे हैं. प्रयागराज में बीएसपी के वरिष्ठ नेता चौधरी सईद अहमद का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश को गलत तरीके से समझा व पेश किया जा रहा है. अदालत ने जाति के आधार पर समाज को बांटने पर चिंता जताते हुए गलत लोगों पर अपना फैसला दिया था, जबकि बीएसपी और पार्टी मुखिया मायावती तो सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय का नारा देकर समाज को जोड़ने और सभी समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक़ सत्ता-शिक्षा व नौकरियों में हिस्सेदारी दिए जाने की हिमायती हैं. चौधरी सईद अहमद का दावा है कि बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों में किसी दूसरी जाति-वर्ग या मज़हब के खिलाफ कोई बात नहीं होगी, सिर्फ ब्राह्मण समाज को पार्टी की नीतियों-कार्यक्रमों और बहन मायावती की सोच के बारे में जानकारी दी जाएगी. ऐसे में यह सम्मेलन कतई अदालत के आदेश की अवहेलना नहीं होंगे.

बहरहाल हाईकोर्ट के आदेश का बीएसपी के ब्राह्मण सम्मेलनों पर क्या असर होगा, इसका पता तो आने वाला वक़्त ही तय करेगा, लेकिन यह ज़रूर कहा जा सकता है कि लोकतंत्र में बड़े-बड़े दावे करने वाली जो पार्टियां आठ सालों में हाईकोर्ट की नोटिस का जवाब देने की ज़िम्मेदारी नहीं पा रही हैं, उनसे ज़्यादा नैतिकता व आदर्श की कोई उम्मीद करना ही बेमानी है. साल 2013 में पीआईएल दाखिल करने वाले मोती लाल यादव ब्राह्मण सम्मेलन पर रोक की मांग को लेकर यूपी के चीफ सेक्रेट्री और अयोध्या के डीएम व एसएसपी को पहले ही लेटर भेज चुके हैं.

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