एलन मस्क 189.7 डॉलर के नेटवर्थ के साथ दुनिया के सबसे बड़े रईस बन चुके हैं। हाल ही में उन्होंने अमेजन के सीईओ जेफ बेजोस को पीछे छोड़ा है। मस्क की कहानी उन करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है, जो अपने दम पर कुछ अलक करने की सोचते हैं। महज 30 की उम्र में मस्क पहुंच गए रूस रॉकेट खरीदने। रूसियों ने उनके इरादों को महत्व नहीं दिया। मस्क का ख्वाब था कि रॉकेट के जरिए पहले चूहों को मंगल पर बस्ती बसाने भेजना है या कुछ पौधों को। जब दूसरी बार भी रूसियों ने खाली हाथ लौटा दिया, तब लौटते वक्त हवाई जहाज में ही मस्क के मन में आया कि क्यों न खुद ही रॉकेट तैयार कर लिया जाए। और यहां से हुई स्पेसएक्स कंपनी की शुरुआत। कदम-कदम पर अड़चनें आती रहीं। लगे हाथ कार निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंसी, प्रौद्योगिकी विकास जैसे अनेक उद्यम भी चलते रहे। 

बड़े सपनों और फौलादी इरादों से दौलत कदम चूमती रही

सपना इतना बड़ा था और इरादे इतने फौलादी कि दौलत कदम चूमती चली। एक दिन वह भी आया, जब मस्क 49 की उम्र में ही पूरी दुनिया के सबसे अमीर इंसान बन गए। एक वह भी दिन था, जब उन्हें ब्वॉयलर की सफाई का काम मिला था, जिसके लिए प्रति घंटा 18 डॉलर मिलते थे और आज वह प्रति घंटा करीब 140 करोड़ रुपये कमा रहे हैं। बेशक, कल्पनाएं ही होती हैं, जो जिंदगी को उड़ान देती हैं।  

ऐसा था उनका बचपन

कल्पना की उड़ान सबसे तेज होती है। वह तब और तेज हो जाती है, जब कोई कथा उसे हवा देती है। आखिर हमारी दुनिया क्या है? दुनिया को कौन चला रहा है? इस दुनिया में हमें करना क्या है? और कमाल है, यह किताब द हिचहाइकर्स गाइड टु द गैलेक्सी  ऐसे ही रहस्य भरे सवालों के पीछे लिए जा रही है। जवाबों तक पहुंचने की तमन्ना लिए वह 14 वर्षीय दक्षिण अफ्रीकी किशोर पृष्ठ-दर-पृष्ठ पढ़ता-बढ़ता जा रहा है। वह किताब बता रही है, यह दुनिया वास्तव में एक सुपर-कंप्यूटर है। ऐसा सुपर-कंप्यूटर, जिसे किसी दूसरे ग्रह पर बैठे लोग अपने सुपर-कंप्यूटर से संचालित कर रहे हैं।

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हमारी दुनिया अकेली नहीं है। ब्रह्मांड में बहुत सारे ग्रह ऐसे हैं, जहां तरह-तरह के लोग रहते हैं। ऐसे ग्रह भी हैं, जहां के लोग धरती का मोल नहीं समझते। धरती चूंकि उनके अंतरिक्ष मार्ग में बाधा बन रही है, इसलिए वे धरती को नष्ट कर देना चाहते हैं। और एक ग्रह ऐसा भी है, जहां के लोग बार-बार धरती बनाते हैं, ताकि वहां जीवन की असली खोज कर सकें, ब्रह्मांड को ठीक से पहचान सकें। ब्रह्मांड में इंसान भी हैं, एलियन भी और रोबोट भी। जिस ग्रह के लोग बार-बार दुनिया या पृथ्वी गढ़ते हैं, उस ग्रह पर भी आर्थिक मंदी आती है और शोध-विज्ञान का काम प्रभावित होता है, लेकिन उस ग्रह के वासी यह ख्वाब संजोए जीते हैं कि फिर एक पृथ्वी गढ़नी है। 

एक किताब ने बदल दिया सोचने का नजरिया

वह 14 वर्षीय किशोर यह सब पढ़कर अचंभित था कि ऐसी भी होता है या हो सकता है। पहले के साहित्य में लोग गुब्बारे के सहारे या किसी पक्षी पर बैठकर चांद पर पहुंच जाते थे, तब यान का आविष्कार भी नहीं हुआ था। एक दिन वह भी आया, जब इंसान चांद पर जा पहुंचा। मतलब, कुछ भी असंभव नहीं। हम एलियन को और एलियन हमें खोज रहे होंगे, जो ज्यादा कुशल होगा, वह खोज में कामयाब होगा। क्या इस खोज में मैं भी शामिल हो सकता हूं? कुल मिलाकर, डगलस एडम्स की उस किताब ने सोचने का पूरा खाका ही बदल दिया। उस किशोर के हमउम्र लड़के खेलने में समय लगाते थे, लेकिन उस किशोर का जीवन मानो अनुसंधान के लिए बना था। वह किशोर समझ गया था कि जीवन वही नहीं है, जो हम अपने आसपास देखते हैं, पूरा ब्रह्मांड जीवन से भरा है। जीवन के तमाम स्वरूपों की खोज में सक्षम होना पड़ेगा और इसके लिए सबसे जरूरी है तकनीकी विकास और इंजीनिर्यंरग में महारत हासिल करना। 

सितारों तक पहुंचने की थी जल्दी 

एक उम्र होती है, जब पूरी मानवता को बचाने का ख्याल आता है, जब लगता है कि खुद ही आगे बढ़कर सब कुछ नष्ट होने से बचाना होगा। कहीं एलियन की कोई दुनिया वास्तव में हमारी दुनिया को खत्म करने की योजना न बना रही हो। तो उसके पहले ही दुनिया के दूसरे ग्रहों पर बस्तियां बसानी पड़ेंगी। उस किताब ने किशोर एलन मस्क (जन्म 1971) को जो मकसद दिया, उससे बेचैनी बढ़ गई। दक्षिण अफ्रीका में रहते अंतरिक्ष खंगालने का अभियान मुमकिन न था, तो मस्क ने संभावनाओं की तलाश शुरू की। मां की मदद से कनाडा की नागरिकता हासिल करते हुए वह प्रौद्योगिकी के गढ़ अमेरिका जा पहुंचे। सितारों तक पहुंचने की जल्दी थी। पीएचडी करने के लिए दाखिला लिया, लेकिन दो दिन में ही लग गया कि तय मकसद में पढ़ाई बहुत कारगर नहीं होगी। सीधे हकीकत में उतरकर खोज में लगना होगा और शायद उससे पहले खोज की दिशा में बढ़ने के लिए संसाधन जुटाने पड़ेंगे। 

प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय



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