पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी चीफ ममता बनर्जी विधानसभा उपचुनाव में कहां से लड़ेंगी यह तय हो गया है। ममता बनर्जी भवानीपुर सीट से उपचुनाव में अपनी दावेदारी पेश करेंगी। उनके अलावा दो अन्य टीएमसी उम्मीदवारों की सीटों की भी घोषणा हो गई है। इनमें जाकिर हुसैन जांगीपुर और अमीरुल इस्लाम समसेरगंज से उपचुनाव लड़ेंगे। इन तीनों सीटों पर 30 सितंबर को उपचुनाव होने वाले हैं। टीएमसी नेता मदन मित्रा ने दिन में ही इस बात के ही संकेत दिए थे कि ममता भवानीपुर से चुनाव लड़ सकती हैं। शाम होते-होते पार्टी ने इस बात की घोषणा भी कर दी।
West Bengal CM and TMC chief CM Mamata Banerjee (in file photo) to contest from Bhabanipur in the Assembly bypolls
TMC candidates Jakir Hossain & Amirul Islam to contest from Jangipur & Samserganj seats respectively
Elections on the three seats will be held on Sept 30 pic.twitter.com/ykoi81ONKE
— ANI (@ANI) September 5, 2021
सीएम बने रहने के लिए ममता का जीतना जरूरी
ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम से हार गई थीं। अगर उन्हें मुख्यमंत्री बने रहना है तो किसी भी हाल में इस उपचुनाव में जीत दर्ज करनी होगी। भाजपा, कांग्रेस और सीपीआई-एम ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है। इसके अलावा मुर्शिदाबाद की दो सीटों, समसेरगंज और जांगीपुर में आठ चरणों के चुनाव में वोट नहीं डाले जा सके थे। यहां पर भी 30 सितंबर को ही उपचुनाव होने वाले हैं। इस उपचुनाव के वोटों की गणना 3 अक्टूबर को होगी। भवानीपुर उपचुनाव के लिए नोटिफिकेशन छह सितंबर को जारी होगा। इसके बाद नामांकन प्रक्रिया की शुरुआत होगी। 13 सितंबर नामांकन की आखिरी तारीख है। वहीं 14 सितंबर को पर्चों की जांच की जाएगी। 16 सितंबर चुनाव से नाम वापस लेने की आखिरी तारीख रहेगी।
सोवनदेव चट्टोपाध्याय ने खाली की है सीट
भवानीपुर विधायक वरिष्ठ टीएमसी नेता सोवनदेव चट्टोपाध्याय ने इस्तीफा देकर इस सीट को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए खाली किया है। चट्टोपाध्याय ने इस सीट पर विधानसभा चुनाव मे 28,000 वोटों से जीत हासिल की थी। उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार अभिनेता से नेता बने रुद्रनील घोष को हराया था। वहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भवानीपुर से 2011 के बाद दो बार जीत चुकी थीं। लेकिन विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपनी परंपरागत सीट के बजाए नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फैसला किया था। यहां पर उन्हें अपने पूर्व सहयोगी सुवेंदु अधिकारी से शिकस्त झेलनी पड़ी थी, जो इस सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे।







