नई दिल्ली: अफगानिस्तान पर तालिबानी के कब्ज़े के बाद से पाकिस्तान खुलकर तालिबान के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है. हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तालिबानी हुकूमत लौटने पर कहा था कि उन्होंने गुलामी की जंजीरे तोड़ दी हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि तालिबान के घटनाक्रम के बाद क्या भारत और पाकिस्तान के बीच की तल्खी में और इज़ाफा होगा? या इस घटनाक्रम से दोनों देशों के रिश्तों में कोई नई तब्दीली देखने को मिलेगी. इन तमाम सवालों के साथ एबीपी न्यूज़ के संपादक सुमित अवस्थी ने भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित से बात की.

अफगानिस्तान के हालातों पर बात करते हुए अब्दुल बासित ने कहा कि पाकिस्तान में हम इसे अलग तरीके से देख रहे हैं. उन्होंने कहा, “जब अमन और जंग की बात होती है तो भारत तारीख (इतिहास) के गलत दो राहे में खड़ा है.” उन्होंने कहा कि ये हकीकत है कि तालिबान ने इस्लामिक एमिरेट ऑफ अगानिस्तान कायम कर ली है और उन्होंने एक नई शुरुआत का भी वादा किया है.

अमेरिका ने अफगानिस्तान से निकलने में की जल्दबाज़ी

जगह जगह फायरिंग और लोगों के विरोध के खिलाफ कार्रवाई करने के सवाल पर अब्दुल बासित ने कहा, “ये उनका आंतरिक मामला है. अमेरिका ने वहां से निकलने में जल्दबाज़ी की. शायद उनका लगता था कि अफगान नेशनल आर्मा तालिबान को टक्कर देगी. तो ये उनकी गलत सोच थी. तालिबान ने कभी नहीं कहा कि वो अफगान नेशनल आर्मी के साथ जंग नहीं करेंगे. वो सिर्फ नेटो और अमेरिकी सेना को टारगेट नहीं करने पर समहत थे. इसलिए तालिबान ने जो एग्रीमेंट में लिखा, उस पर काफी हद तक अमल किया है.”

अब्दुल बासित ने कहा कि तालिबान ने बहुत जद्दोजेहद किया. उन्होंने 20 सालों तक संघर्ष किया. उन्होंने हमेशा यही कहा कि हम विदेशी कब्ज़े के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. इसलिए उनका संघर्ष बिल्कुल जायज़ था. अब्दुल बासित ने आरोप लगाते हुए दावा किया कि भारत ये कोशिश करेगा कि तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता न मिले. 

 

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