राजनीति के गलियारों में कई बार तीखे मोड़ आते हैं, जो कुछ खास घटनाओं और खास शख्सियतों की वजह से पैदा होते हैं। आइए एक नज़र डालें उन घटनाओं पर जो राजनीति के इतिहास में अपना खास स्थान बना चुकी हैं, जैसे किसान आंदोलन। पेश है किसान आंदोलनों के राजनीतिक असर को बयां करती वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्‍ल की ये रिपोर्ट-

पूस की रात… कफन और गोदान पढ़कर आए शहरी मध्य वर्ग के दिमाग में किसान के बारे में धारणा वही बनी है, जो मुंशी प्रेमचंद ने हल्कू, घीसू या होरी की प्रस्तुत की है। लेकिन 1930 के दशक से हालात अब काफी बहुत बदल चुके हैं। इसीलिए पिछले महीनों चले ‘किसान आंदोलन’ में जब वे देखते हैं कि दिल्ली के गाजीपुर और सिंघू बॉर्डर को घेरे बैठे किसान तो मर्सडीज जैसी गाड़ियों से आए हैं और उनके टेंट तो वातानुकूलित और वॉटरप्रूफ हैं, तो वे अचरज से भर जाते।

यह सच है कि आज का किसान पहले से बहुत बदल चुका है, लेकिन इस स्थिति तक आने के लिए किसानों को बड़े-बड़े आंदोलन करने पड़े। देश का सबसे बड़ा ‘किसान आंदोलन’ अभी पिछले दिनों ‘कृषि कानूनों’ के विरोध में चला। यह 26 नवंबर 2020 से शुरू हुआ और इसका समापन 12 दिसंबर 2021 को हुआ। वह भी तब जब 19 नवंबर 2021 को प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानूनों की वापसी की घोषणा की।

इस किसान आंदोलन ने राजनीति को बड़े स्तर पर प्रभावित किया है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और केंद्र की राजनीति को। किसान आंदोलन का असर पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों पर भी साफ देखा जा सकता है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में किसानों ने सीधे तौर पर केंद्र की नीतियों का विरोध किया। ये किसान आंदोलन का ही असर था कि पांच राज्यों में होने वाले चुनावों के मद्देनजर केंद्र सरकार को अपने तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। इससे पता चलता है कि देश के चुनावों पर किसान अपना गहरा असर डालते हैं।

इस आंदोलन से पहले भी किसानों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में कई बार आंदोलन किए थे। दिसंबर 1986 में ट्यूबवेल से सिंचाई के लिए बिजली दरों को बढ़ाने के खिलाफ बड़ा आंदोलन हुआ था। 1988 में दिल्ली के बोट क्लब में लाखों किसानों ने धरना दिया था, जिसके बाद सरकार को झुकना पड़ा था और महेंद्र सिंह टिकैत अखिल भारतीय स्तर के किसान नेता बन गए थे।

लेकिन जब भी हम किसानों के आंदोलन की बात करते हैं तो दिमाग में अवध का किसान आंदोलन उभरता है, यह संभवत: देश का सबसे बड़ा किसान आंदोलन था और इसने इतना असर डाला कि आजादी की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को भी किसानों की समस्याओं से रूबरू होना पड़ा। यूं तो 1917 में मोतीलाल नेहरू, मदन मोहन मालवीय और गौरीशंकर मिश्र आदि ने ‘उत्तर प्रदेश किसान सभा’ बनाई थी, लेकिन गांधी जी के ‘खिलाफत आंदोलन’ के कारण उत्तर प्रदेश किसान सभा में मतभेद प्रकट होने लगे।

आखिरकार अवध के किसान नेताओं ने बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में 1920 में ‘उत्तर प्रदेश किसान सभा’ से नाता तोड़कर 17 अक्टूबर, 1920 को ‘अवध किसान सभा’ बना ली। चूंकि ‘उत्तर प्रदेश किसान सभा’ में अवध के किसानों की भागीदारी ही सबसे ज्यादा थी इसलिए बाबा रामचंद्र ने अपने किसान संगठन का नाम ‘अवध किसान सभा’ रखा था। प्रतापगढ़ जिले का ‘खरगांव’ किसान सभा की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बना।

यह किसान सभा किसानों के हक में ब्रिटिश हुकूमत के सामने अपनी वाजिब मांगें रखती थी और अंग्रेजों पर दबाव डालकर अपनी वाजिब मांगें मनवा भी लेती थी। 1919 के अंतिम दिनों में किसानों का संगठित विद्रोह खुलकर सामने आया। प्रतापगढ़ जिले की एक जागीर में ‘नाई-धोबी बंद’ सामाजिक बहिष्कार करने की पहली संगठित कार्रवाई थी। अवध के किसान नेताओं में बाबा रामचंद्र, गौरीशंकर मिश्र, माताबदल पांडेय, झिंगुरी सिंह आदि शामिल थे।

‘उत्तर प्रदेश किसान सभा’ से नाता तोड़कर अवध किसान सभा तो बन ही चुकी थी। एक महीने के भीतर ही अवध की ‘उत्तर प्रदेश किसान सभा’ की सभी इकाइयों का ‘अवध किसान सभा’ में विलय हो गया। इस नवगठित ‘अवध किसान सभा’ के निशाने पर मूलत: जमींदार और ताल्लुकेदार थे। यूपी के हरदोई, बहराइच एवं सीतापुर जिलों में लगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने ‘एका आंदोलन’ चलाया था। इस आंदोलन में कुछ जमींदार भी शामिल थे। इस आंदोलन के प्रमुख नेता मदारी पासी व सहदेव थे। ‘एका आंदोलन’ की क्रांतिकारी शुरुआत 28 दिसंबर, 1921 को हुई।

द्वितीय विश्वयुद्ध के छंटनीशुदा सैनिकों ने भी इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘अवध किसान सभा’ में गांव-देहात के बाबा लोगों का रोल भी अहम था। साधुओं व फकीरों की जमात भी इस आंदोलन में शरीक थी और इसीलिए बाबा रामचंद्र खुद भी अपना बाना बाबाओं जैसा ही बनाए रहते। इस आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ‘अवध किसान सभा’ की महत्वपूर्ण विशेषता थी। बाबा रामचंद्र की यह किसान सभा एक तरह से उन किसानों का संगठन थी, जिसमें ज्यादातर खेतिहर मजदूर थे। यह सही है कि बाबा रामचंद्र को किसान आंदोलन शुरू करने की प्रेरणा कांग्रेस के ‘सत्याग्रह आंदोलन’ से मिली थी।

उन्होंने चंपारण में निलहे गोरों के खिलाफ गांधी जी की अगुआई में शुरू हुए आंदोलन को देखा था। लेकिन उनका पूरा फोकस किसानों और मजदूरों पर था। इसलिए कांग्रेस के आंदोलन से उनका आंदोलन भिन्न था। गांधी जी व कांग्रेस ने किसानों की पीड़ा को व्यापक रूप दिया और उसे आजादी के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन बाबा रामचंद्र जानते थे कि जब तक ये किसान-मजदूर खुद खड़े होकर अपने लिए नहीं लड़ेंगे, तब तक आजादी एक छलावा ही रहेगी। देश से अंग्रेज चले जाएंगे तो काले अंग्रेज आ जाएंगे।

20वीं सदी के शुरू होते ही बंगाल सूबे का बंटवारा हुआ और रैयतवारी व्यवस्था तथा बंदोबस्त प्रणाली लागू हुई। अवध के किसानों पर इसका और भी बुरा असर पड़ा। उपजाऊ नई जमीनें समतल तो किसान करते, लेकिन जैसे ही फसल उगाने का क्रम शुरू होता, उन पर लगान की नई दरें लागू हो जातीं। ऐसे ही बुरे समय में गांधी जी ने राजनीति में आकर किसानों की समस्या को सबके सामने रखा। चंपारण में राजकुमार शुक्ल के साथ मोतिहारी जाकर उन्होंने किसानों की पीड़ा को महसूस किया और किसानों को निलहे गोरों के जुल्म से आजाद कराया।

गांधी जी इसके बाद कांग्रेस के बड़े नेता हो गए। लेकिन दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से किसानों का गांधी जी से मोहभंग हो गया। पूरे अवध के इलाके में किसान तबका बुरी तरह परेशान था। शहरी क्षेत्रों में नई मिलें खुलने तथा रेलवे, कचहरी और व्यापार के चलते गांवों का पढ़ा-लिखा तबका शहर आ बसा। शहरों की इस कमाई से उसने गांवों में जमींदारी खरीदनी शुरू कर दी। ये नए कुलक किसी और गांव में जाकर जमींदारी खरीदते और अपनी रैयत से गुलामों जैसा सलूक करते। इन नए शहरी जमींदारों को कांग्रेस का परोक्ष समर्थन भी रहता।

यह वह दौर था जब अवध में किसानों के संगठन बाबा रामचंद्र या मदारी पासी के नेतृत्व में बनने लगे। बिहार में त्रिवेणी संघ और अवध में तीसा आंदोलन इसी दौर में पनपे। इनको परोक्ष रूप से क्रांतिकारी संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी व साम्यवादी संगठनों का भी समर्थन था। सत्यभक्त, राधा मोहन गोकुल, राहुल सांकृत्यायन, स्वामी सहजानंद भी किसानों को संगठित करने में लगे थे। लेकिन ‘तीसा आंदोलन’ गांधी जी के असहयोग और पंडित नेहरू की उदासीनता के चलते अंग्रेजों द्वारा कुचल दिया गया, लेकिन इससे यह समाप्त नहीं हुआ। अंग्रेजों को किसानों को तमाम सहूलियतें देर-सबेर देनी पड़ीं और एक निश्चित अवधि के बाद किसानों को जमीन पट्टे पर लिखनी पड़ी।

पहले विश्वयुद्ध के कुछ पहले जब निलहे गोरों से किसानों को मुक्ति मिल गई, तो देसी निलहों ने उन जमीनों पर कब्जा कर लिया और किसानों पर जुल्म करने लगे। लगान नकद देने की व्यवस्था के कारण किसान के पास कुछ हो या न हो लगान भरना ही पड़ता था। एक ऐसे समय जब फसलों के नकदीकरण की कोई व्यवस्था न थी, लेकिन लगान नकद देना पड़ता था, इस वजह से अवध के किसान बेहाल थे। ऐसी बेहाली के वक्त अवध में किसानों का एक बड़ा आंदोलन हुआ, जिसे ‘तीसा आंदोलन’ कहा गया। अंग्रेजी के मशहूर उपन्यासकार मुल्कराज आनंद स्वयं चलकर इलाहाबाद और लखनऊ गए तथा उन्होंने एक उपन्यास लिखा- ‘द सोर्ड एंड द सिकल।’

इसमें नायक को लगता है कि गांधी जी ने किसानों के साथ न्याय नहीं किया। इस देश में किसान ही सदैव व्यवस्था से लड़ा है। सब जगह किसान ही आंदोलन करते हैं, धर्म, न्याय व समानता के लिए। 1857 में किसान ही आगे बढ़कर अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हुए थे। देसी पलटन और स्थानीय राजा उनको लेकर ही लड़ रहे थे।

बारदोली सत्याग्रह

1928 में सूरत (गुजरात) के बारदोली तालुका में किसानों द्वारा लगान न देने के लिए आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन में सिर्फ कुनबी-पाटीदार जातियों के भू-स्वामी किसानों ने ही नहीं, बल्कि सभी जनजाति के लोगों ने हिस्सा लिया। सरदार पटेल ने इसका नेतृत्व किया।

गुजरात में खेड़ा सत्याग्रह

1918 में गांधी जी ने गुजरात में खेड़ा के किसानों की समस्याओं को लेकर आंदोलन शुरू किया। तब खेड़ा के कुनबी पाटीदार किसानों ने सरकार से लगान में राहत मांगी थी, लेकिन उन्हें कोई रियायत नहीं मिली। इस आंदोलन में सरदार वल्लभ भाई पटेल भी शमिल हुए।

मोपला किसान विद्रोह

1920 में केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपला किसानों द्वारा विद्रोह शुरू किया गया। प्रारंभ में यह विद्रोह अंग्रेज हुकुमत के खिलाफ था। बाद में इस आंदोलन ने हिंदू-मुस्लिम के बीच सांप्रदायिक आंदोलन का रूप ले लिया, जिसे बाद में अंग्रेजों ने कुचल दिया।

रामोसी किसानों का विद्रोह

1879 में महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में रामोसी किसानों ने जमींदारों के अत्याचारों के खिलाफ विद्रोह किया था। इसी तरह आंध्र प्रदेश में सीताराम राजू के नेतृत्व में एक किसान आंदोलन चला, जो 1922 तक छिटपुट तरीके से चलता रहा।

यूपी में किसानों का ‘एका आंदोलन’

1919 के अंतिम दिनों में यूपी के हरदोई, बहराइच और सीतापुर जिलों मे ंलगान में वृद्धि एवं उपज के रूप में लगान वसूली को लेकर अवध के किसानों ने ‘एका आंदोलन’ चलाया। हालांकि इस आंदोलन की क्रांतिकारी शुरुआत 1921 में हुई।

मप्र के मंदसौर में किसान आंदोलन

2017 में मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में किसानों ने आंदोलन किया था, जिसमें पुलिस की गोली से सात किसानों की मौत भी हो गई थी। किसानों के हिंसक प्रदर्शन से शिवराज सरकार बैकफुट पर आ गई थी। आंदोलन के दौरान किसानों ने बैंकों, पुलिस चौकी और ट्रेन को अपना निशाना बनाया।

बिजली संकट के खिलाफ

1988 में भी किसानों ने अपनी मांगों को लेकर दिल्ली के बोट क्लब पर प्रदर्शन किया था। देशभर से करीब 5 लाख किसान इकट्ठा हुए थे। इस आंदोलन का नेतृत्व किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत ने किया था। यह आंदोलन बिजली संकट को लेकर किया गया था।

कम कीमत पर गल्ला वसूली

1946 में आंध्र प्रदेश में ‘तेलंगाना आंदोलन’ जमीनदारों और साहूकारों के शोषण की नीति के खिलाफ तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध शुरू किया गया था। ‘कम कीमत पर गल्ला वसूली’ इस आंदोलन का मुख्य कारण था।

बिहार का ताना भगत आंदोलन

1914 में बिहार में किसान आंदोलन हुआ। यह आंदोलन लगान की ऊंची दर तथा चौकीदारी कर के विरुद्ध था। इस आंदोलन के मुखिया जतरा ताना भगत थे। यह एक तरह से बिरस मुंडा के आंदोलन का ही विस्तार था। जो काफी हद तक सफल भी रहा।



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