प्रणब दा कई दशकों की सक्रिय सियासत के बाद जब 2012 में राष्ट्रपति बनकर रायसीना हिल पहुंचे, तो सबको उम्मीद थी कि उनकी ये पारी भी नायाब होगी। पीपुल्स प्रेसिडेंट की छवि बनाकर गए कलाम के बाद प्रणब दा की पारी पर सबकी निगाह थी। शायद पहली बार सार्वजनिक जीवन के इतने विशाल अनुभव का व्यक्ति राष्ट्रपति बना था।

प्रधानमंत्री का पद छोड़कर लगभग सभी अहम मंत्रिमंडल के विभाग और नम्बर दो की हैसियत से सरकार में दबदबे के बाद राष्ट्रपति की उनकी भूमिका को लेकर कुछ लोगों को आशंकाए भी थीं। ये माना जा रहा था कि कहीं कुछ मुद्दों पर टकराव न हो, लेकिन दादा ने मार्गदर्शक की भूमिका को ही चुना। उन्होंने कभी कोई ऐसी मुश्किल नही पेश की जिससे राष्ट्रपति भवन और सरकार के बीच दूरी बने, बल्कि कहा जाता है कि जब भी सरकार के सामने कोई संकट होता था कांग्रेस नेतृत्व राष्ट्रपति भवन उनकी सलाह के लिए पहुंच जाता था।

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यूपीए सरकार गई तो भी दादा ने एक बार फिर सभी आशंकाओं को निर्मूल साबित किया और प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी से भी उनकी खूब बनी। प्रधानमंत्री मोदी के लिए वे एक गाइड की भूमिका में थे। जिसे खुद मोदी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकारा। अपने ज्ञान और अनुभव से सभी दलों में समान लोकप्रिय दादा कभी भी सार्वजनिक जीवन के उच्च मापदंडों से समझौता करते हुए नहीं दिखे।

पद के मुताबिक गरिमा उनमें स्पष्ट झलकती थी। वे एक ऐसा नेता थे जिनके लिए संविधान और रूल बुक सबसे अहम था। राष्ट्रपति भवन में प्रणब दा ने दया याचिकाओं पर सख्त रुख अपनाया। उनके सम्मुख 34 दया याचिकाएं आईं और इनमें से 30 को उन्होंने खारिज कर दिया। कलाम की ही तरह जनता के राष्ट्रपति के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले मुखर्जी को राष्ट्रपति भवन को जनता के निकट ले जाने के लिए उठाए गए कदमों के लिए भी याद किया जाएगा। उन्होंने जनता के लिए इसके द्वार खोले और एक संग्रहालय भी बनवाया।





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